हरिहर झा

जून 7, 2007

चुभन

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:51 पूर्वाह्न

         ******

जीवन का फैलाव – एक चुभन

 मौत का दंश  एक – चुभन

 

जीवन के चौराहे पर

मिले कईं लोग

मित्रता की रश्मियों का

कर रहे उपभोग

पर प्यार की टीस में

डूबता मन – एक चुभन

 

जीवन का फैलाव – एक चुभन

मौत का दंश  एक – चुभन

  

सृष्टि कितनी खोखली

धूल पत्थर के मोल

तारे ग्रह नक्षत्र

बस घूमते गोलगोल 

पर अंगड़ाई लेती चेतना

नन्ही सी पृथ्वी मे – एक चुभन

 

जीवन का फैलाव – एक चुभन

मौत का दंश  एक – चुभन

  

यों तो युद्ध मे छटपटाये

और गिरे शव हजार

बम फटे खून की होली

हुये अगणित वार

पर मां की गोद मे

तड़प कर मरता शिशु – एक चुभन

   

जीवन का फैलाव  – एक चुभन

मौत का दंश  एक – चुभन

     

नरक नौग्यारह रसातल

आदमी की नीव हिला गये

गगनचुंबी मानवों को

क्षुद्र कीड़े क्यों बना गये

पर दूधमुंहे मस्तिष्क मे

विषबीज का आरोपण – एक चुभन

    

जीवन का फैलाव – एक चुभन

मौत का दंश – एक चुभन।

         

              -हरिहर झा

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4 टिप्पणियाँ »

  1. Harihar ji….aapki kavita mujhe achchhi lagi…badhiya he…taarkikataa ke sath he isliye aur achchhi he…

    टिप्पणी द्वारा bhaskar — जून 7, 2007 @ 5:45 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. Bhaskar Ji

    Bahut bahut Dhanyavaad

    -Harihar

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जून 7, 2007 @ 6:30 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  3. जीवन के कटू सत्य को उजागर करती हुई रचना है आप की…

    वैसे है सभी कुछ जहां में… अब किस को क्या मिला ये मुक्कदर की बात है

    हमे कवित बहुत पसन्द आयी… लिखते रहिये

    टिप्पणी द्वारा mohinder — जून 7, 2007 @ 7:41 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  4. Mohinder Ji

    Yah jaan kar achchhaa lagaa ki kavitaa aapko pasaNd aayi.
    Dhanyavaad

    -Harihar Jha

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — जून 7, 2007 @ 9:45 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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