हरिहर झा

फ़रवरी 1, 2007

साल मुबारक

Filed under: अतुकांत,अनुभूति,हिन्दी — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:20 पूर्वाह्न

यारों मुझे सालमुबारक कर लेने दो
पल दो पल खुशी मे जी लेने दो
तुम सच कहते हो
कल किसी आतंकवादी बम से
आसमान फट पड़ेगा
तो मेरी फटी कमीज़ के तारतार से
आसमां को भी सी दूंगा
पर आज मेरे दिल की नसें मत चिरने दो
यारों मुझे साल मुबारक कर लेने दो

माना कल सार्स के कीटाणु
मेरे जिस्म को बनाएंगे छलनी
राजा न बच पाएगा
भिखारी की दाल क्या गलनी
कैन्सर का क्यों डर दिखाते
नन्हीं सी जान के लिए
किसी सरकारी अस्पताल में
हैजे से उबर कर मलेरिया से मरने दो
यारों मुझे साल मुबारक कर लेने दो

शनि राहू के अन्धे डर
तुमने मिटाए तो मिट गए
जोशी के पंचांग पर
तुम ग्रह बने वे पिट गए
अब डराते हो कि ज़मीन पर गिरेगें
घूमते कृत्रिम उपग्रह के कबाड़
तो कहर ही ढ़ा देगें
बहस मे फेकी हुई तश्तरियों के कचरे

नए र्वष की
शुभकामनाओं की झड़ी
एटमी ब्रह्मास्त्र को क्या भाएगी
रंगीन आतिश का माहौल देख कर
उल्टी गिरती उल्का संभल जाएगी
तो दुर्देव की भेजी हुई
बिजली की दमक का हिसाब
आंखों की चमक से कर लेने दो
यारों मुझे सालमुबारक कर लेने दो
पल दो पल खुशी मे जी लेने दो।

हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/naya_saal/sets/harihar_jha.htm

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1 टिप्पणी »

  1. हिंदी कविता में नया साल
    समकालीनता के परिप्रेक्ष्य में
    —डा जगदीश व्योम

    आज का परिवेश ऐसा है कि जहाँ देखो वहीं लोग परेशान हैं। उनके बीच कब, कहाँ और क्या हादसा हो जाए किसी को कुछ पता नहीं। आतंकवाद का दानव जगह-जगह अपना दाँव लगाए बैठा है-
    हर तरफ़ बारूद का मौसम, कहाँ जाकर रहें,
    आदमी भी हो गया है बम, कहाँ जाकर रहें।
    गावँ में पहुँचे, वहाँ भी आग के चर्चे मिले
    धूप के अख़बार, उठती धूल के पर्चे मिले
    हर गली हर मोड़ पर, कुछ चोर या डाकू मिले
    लाठियाँ उठती हुईं, चलते हुए चाकू मिले।
    -डॉ. कुँअर बेचैन

    ऐसे माहौल में भविष्य का क्या पता, इसलिए क्यों न आज थोड़ी ख़ुशियों के साथ कुछ पल गुज़ार लिए जाएँ-
    तुम सच कहते हो-
    कल किसी आतंकवादी बम से
    आसमान फट पड़ेगा
    तो मेरी फटी कमीज़ के तार-तार से
    आसमाँ को भी सी दूँगा
    पर आज मेरे दिल की नसें मत चिरने दो
    यारों मुझे साल मुबारक कर लेने दो
    -हरिहर झा

    धन्यवाद जगदीश जी

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — मार्च 8, 2007 @ 3:10 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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