हरिहर झा

फ़रवरी 1, 2007

न इतना शरमाओ*

Filed under: अनुभूति,गीत,मंच,हिन्दी — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:30 पूर्वाह्न

 मधुर मिलन की दो घडियों में
प्रिये ! न इतना शरमाओ
उषा की लाली लज्जित हो
घनमाला में छिप जाए

छलक उठी नैनों की मदिरा
बह जाने के लिये नहीं है
मुस्कानों में फूल महकते
मुर्झाने के लिये नहीं हैं
युवा उमंगों की यह सरिता
थम जाने के लिये नहीं है
खिली कली या मादक यौवन
संकुचाने के लिये नहीं है

इतराओ रूठो मुस्काओ पर
इतना मत शरमाओ
उषा की लाली लज्जित हो
घनमाला में छिप जाए

इंद्रधनुषी मुद्राएं
घूंघट में खेलीं किसने जानीं
प्रीत की लहरें मन ही मन
उठीं भला किसने पहचानीं
अल्हड़ यौवनकी अल्हड़ता
मादकता किससे अनजानी
नहीं गुदगुदाता कोकिल स्वर
बोलो बगिया की रानी

मदमाती मत पलकें मूंदो
यों इतनी मत शरमाओ
उषा की लाली लज्जित हो
घनमाला में छिप जाए

 -हरिहर झा

*(संगीत-रूप में उपलब्ध)

http://www.anubhuti-hindi.org/1purane_ank/2003/05_24_03.html

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2 टिप्पणियाँ »

  1. yo itni mat sharmao
    bahe khuli hai meri
    bas ek bar aa jao
    dhadkne kar rahi hai
    tumhara intzar
    me hu kab se bekrar

    टिप्पणी द्वारा mukesh vhora — मई 24, 2007 @ 10:29 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. Vaah Mukesh Ji, Kyaa Baat hei! Khoob Kahi
    Dhanyavaad.

    -Harihar

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — मई 27, 2007 @ 8:16 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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