हरिहर झा

जनवरी 31, 2007

अर्थहीन कविता

Filed under: अतुकांत,रचनाकार,हिन्दी — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:27 अपराह्न

सार्थक है वह कविता –
जो मंत्रियों की चाटुकारिता से
परहेज न करे
जो राजों रजवाड़ों के भाट चारण का
वारिस हो सके
करोड़ीमल के संस्मरण में
कुछ प्रशस्तियाँ गा सके –

पर इस अर्थ प्रधान
स्वार्थ प्रधान युग में
पुरस्कार की क्या बात
जो चार पैसे न कमा कर ला सके
अर्थहीन है वह कविता….

अर्थहीन है वह कविता …
बिखरे विचारों की सजावट करती हुई
भ्रष्टाचार से बगावत करती हुई
विवश विद्रोह को मायने देती हुई
मियां मिठ्ठुओं को आइना दिखाती हुई
या फिर प्रेम की रंगीनियों में सोई हुई
प्रकृति के आगोश में खोई हुई
अर्थहीन है वह कविता….

पर ऐसी कविता
जो किसी ख़ेमे में छीना झपटी कर
झंडा उठा ले
राजनीतिक वादों इरादों पर
अपनी तुकबन्दी की छाप छोड़े
और मोदक की थाली की तरह सजाए –
खयाली पुलावों की चाशनी से बने
चुनावी घोषणा पत्र पर कसीदे करे
सफल है वह कविता…

जो जोखिम उठाए
रद्दी की टोकरी में गिर जाने का
पाखंडी शिखंडियों का मखौल सहने का
नेता भए विधाता के तीसरे नेत्र खुलने का
और सच का साथ दे
मोटी खाल में छिपे काइयाँपन को
व्यंग बाणों से भेद कर
लहूलुहान करे
तू-तू मैं-मैं की चीख पुकार के बीच
किसी अनहत नाद की सी प्रतीक्षा में
शांत सौम्य आनंदित भाव से
विवेक विचार का सृजन करे
अर्थहीन है वह कविता …

http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_18.html

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2 टिप्पणियाँ »

  1. हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया में आपका स्वागत् है.

    शुभकामनाएँ.

    आग्रह है कि नियमित लिखें.

    टिप्पणी द्वारा रवि — फ़रवरी 9, 2007 @ 3:26 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया

  2. Bahut bahut Dhanyavaad.

    टिप्पणी द्वारा Harihar Jha हरिहर झा — फ़रवरी 9, 2007 @ 4:10 पूर्वाह्न |प्रतिक्रिया


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