न मिली थी माँ की थपकियां
और अब खो दी
प्रेमिका की स्मित मुस्कान
तो चल पड़ा वह
आकांक्षा लिये विश्वविजय की
पत्थर सी जड़ आंखों में
एक सपना दबाये
जिसमें मंद झकोंरों से गुजरी किरण किरण
चंचल नयनो में प्रतिबिम्बित होती
उस मतवाली का
चेहरा उठाये
अधरों की ओंट से अधर जोड़ने की प्यास
चुहुल करते ली थी उसने अंगड़ाई
रंगीन छेड़छाड़ और बिखरते मोती
प्रेम का स्पन्दन
पर ह्दय को मसोस कर
दबा गया कोमल भाव
अकेलेपन का सताया
जब रिश्तों ने
झूठा नाटक रचाया
तो अलग थलग होकर
बिछाये थे जो अरमान
कुचल डाले उसने
अब तो चमक रही युगल मीनारें गगनचुंबी
जो फैला रही खून से सनी हुई बाहें
डूबा वह शतरंज की क्रीड़ा में
मोहरा बना
जुनून से भरा उसका माथा पकड़ा उंगलियों ने
फूट पड़ा एक दर्दनाक प्रतिशोध
जब बारूद बनी दमित कुंठा
विषमय बनी यौन पिपासा
ज्वाला चिंघाड़ी अन्तर्मन की गहराइयों से
अमंगल ही तो हुआ
पर हुआ जो धमाका
गाज गिरी जो मिट्टी को मथकर
राक्षस का उद्गम
जो सोंचता -
यह आतंकवादी दुनियां
क्यों मुझे ही कहती
आतंकवादी
मैं इसकी
सजा दूंगा
धमाकों से बरबाद होंगे
वे घरबार
सब के सब
दीवार बन कर
खड़े हैं मेरे और उसके बीच
ये सड़क और गलियां
जो उसके पास
नहीं ले जाती
कर दूंगा इन्हे तबाह
और जो मरेगें
उसके स्वजन
उसके चाचा, मामा, ताउ
मामुली किसान और मजदूर का भेष धरे
मैं खत्म कर दूंगा यह धोखा
बन्दूक और बम गोले हैं
मेरा पुरूषत्व
अहा ! मुझे मिलेगी मेरी मंजील
कैसा विपल्व ? कैसी विनाशलीला?
सब कुछ होगा कितना रोमान्टिक !
यह विस्फोट या संभोग?
मैं कोई विक्षिप्त नहीं ….
-हरिहर झा
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रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार
बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार
भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार
भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार
भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार
माँ की लीला कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार
प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार
छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार
क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम -
पुष्प के रस का तार
बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।
-हरिहर झा
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हरिहर झा › सिडनी हिन्दी समाज द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन क्रूज़ में
बचपन की सहपाठिन मिल गई शुरू हुये ईमेल
बीवी ने जब बांच लिये तो खतम हो गया खेल
पूछपरछ मे धमधम गीरते बर्तन के खूब शोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
आफिसगर्ल से पटते पटते जगी हमें कुछ आस
गड़प कर गया बॉस उसे तो हमे न डाली घास
कभी न दोनो मिल पाये फिर नदियों के दो छोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
सेलगर्ल ने बक्सा खोला दिखलाये सब अंग
अर्धागिंनी ने आधे में ही किया रंग मे भंग
तांक-झांक सब ऐसी पकड़ी नजरों के हम चोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
साकी बाला मुफ्त पिला कर कर गई मटियामेट
घर बिज़नेस न छोड़ा हमने उगल दिये सिकरेट
बुद्धि नशे मे भ्रष्ट हो गई मूर्खो के सिरमौर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
- हरिहर झा
Love is an illusion :
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मानव जिस अंग पर रह गया अधुरा
कुदरत और रास्ते से कर देती पूरा
चकराये विश्लेषक जहां से तू आधा
वहां से दी खासियत दूर कर दी बाधा
प्यार जिन्हे मिला नहीं हिनता से भर जाते
हिट करते औरो को हिटलर से हो जाते
प्रकृति की भूल से खा ली जो चोंट
क्षतिपूर्ति मिल जाती भर जाती खोट
मनस्विद निगोड़े देखते क्यो न अच्छाई
जड़ मे से खोज लाते कैसी भी बुराई
वे कहते अवश्य ही कहीं से तू कम है
तेरे व्यक्तित्व मे जिससे दमखम है
कमजोर आंखे तुझे बना गई चित्रकार
कानो से बिथोविन बन गये संगीतकार
कौशल व प्रतिभा से पाइलट बन जाते
बौनापन हिनग्रंथी महज वे भर पाते
आपकी बातों मे मजा बहुत आ गया
कुछ भी जोड़ने को मेरे मन भागया
शेर लपकने मे दिखलाते हैं स्फुर्ति
आलसी मन होगा हो गई क्षतिपूर्ति
बोझ से लदी होंगी फुदकती तितलिया
गम मे डूबी होंगी तैराक मछलिया
मेरे नाखुन मे कुछ दर्द सा हो जाता
बदले मे काश मैं मिलियोनर हो जाता
कहते हो सत्य तुम स्वीकार मै करता हूं
तुम्हारी थ्योरी यों तुम पर मै धरता हूं
दिमाग से रुग्ण जो स्वयं को पाते
क्षतिपूर्ति करने को मनस्विद हो जाते।
-हरिहर झा
सच कहा है
नियति पर किसी का वश नहीं चलता
इंसान अपना भाग्य नहीं बदलता
पत्ता पत्ता इश्वर की आज्ञा से हिलता है
वह चाहे तो
बेमौसम फूल खिलता है
विधि का विधान
क्या बदलेंगे देवदूत
हाथ की लकिरें हैं
सिमेंट सी मजबूत
भले ही विज्ञान ने
दुनियां की शक्ल बदल डाली
दवाओं ने इंसान की
उम्र बदल डाली
पर बदलने वाले हैं वे जो अभी नासमझ हैं
अक्ल के कच्चे हैं
जो दर्शन और संस्कृति के ज्ञान मे
अभी बच्चे हैं
वे जूझते हैं टकराते हैं
धरती की धूल उड़ा कर
ग्रहों मे पत्थर ढुंढते हैं
चांद के बाद मंगल मे
क्या राशियों का मिलान ढुंढते है?
नादान !
समझ ले किस्मत का लिखा हुआ
किस्मत तेरे हाथ मे धरेगा
भाग्य मे लिखी इसी मंगल को मौत
तो तू मंगल को मरेगा
यह बात अलग
कि किसी टीके के प्रभाव मे
बीस साल बाद
तू बुध को मरा
तो भाग्य की बदलाहट को
जानेगा कैसे ?
बिना पढ़े भाग्य का परिवर्तन
पहचानेगा कैसे ?
कहेगा किस्मत मे था सो हुआ
क्योंकि किस्मत से डरना था
समझेगा बुद्धू यही कि
तुझे बुध को मरना था।
- हरिहर झा