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पिचकारी खेले ससुरी ऐसे लुभायमान लगती रंग से भरी वो जग किसके रंग से रंगमय हो रहा कलाई से पकड़ कोई मसखरी करता नखरारी नार की अल्हड़ता कैसी?
http://hindinest.com/kavita/2007/06.htm http://rachanakar.blogspot.com/2007/03/hori-kherat-nakhari-nar.html |
मार्च 8, 2007
नखरारी नार
फ़रवरी 16, 2007
ऐसा बोर सैयां
रंग फेका लाल गुलाबी
वो वेवलेन्थ की बात करने लगा
बुद्धु नादान सैयां
आइन्स्टीन को मात करने लगा
मैंने छोड़ी पिचकारी
वो हवा के दबाव की बात करने लगा
खिला दी मैंने कुछ मिठाई
शुगर की चिन्ता दिनरात करने लगा
गिनी चुनी लकडि़यां
भाई लोगों ने इकठ्ठा की
जलती होली देख कर
पर्यावरण की बात करने लगा
समझाया असत्य पर
सत्य की होती विजय
होलिका जली प्रह्लाद बच गया
वो फायरप्रूफ कपड़ों की बात करने लगा
फिल्मी स्टार झूमे नाचे
दे गये होली का रंग
देखी मस्ती टी वी पर
टी वी के एन्टेना की बात करने लगा
गीत कवित्त भजन
होलीरस मे डुबा गये
हुल्लड़टोली की गाली सुन कर
भाषाव्याकरण की बात करने लगा
राधा किशन का होलीरास
मथुरा मे शुरू होने लगा
ऐसा बोर सैयां
वो द्वारका की खुदाई की बात करने लगा
हरिहर झा
मार्च 15ई 2005
मौसम
सर्दी आई तो
सिकुड़ गये प्राण
छीन गई हृदय की उष्मा
जिसमे पंखुड़ियां खिल खिल जाती थी
अबोध चिड़िया मीठे गाती थी
बस, डरा धमका कर
कुरेद गई सिहरन से कम्पित घाव को
खामोश रह कर देखता हूं इस बदलाव को
और अब महसूस करता हूं बेचैनी से
गर्मी में करवट बदल बदल कर
पसीने में लथपथ जीजिविषा
तबाही मची है
गतिमान हो कर बह निकली चासनी अंगप्रत्यंग से
चिन्गारियों का यह सिलसिला
जाने कब तक जारी रहेगा
कौन सुलझा पायेगा मौसम की
इन गुत्थियों को
सामने संगमरमर की तराशी हुई मूर्ति
अपने ताज पर
सहनशीलता का भर लिये ऐंठी है
चटख जाने के डर से
अपने वातानुकूलित कक्ष मे बैठी है
बाग में पंखुड़ी
जो सहती है सब कुछ चुपचाप
वितरागी हो कर झुलस जाती है
उसके धर्मग्रन्थ मे यही लिखा है
कि पंखुड़ी झुलसती है
फिजा मे फिर से शामिल होने के लिये
लेकिन जब कर दिया झुलसने से इन्कार
एकता के हार ने
मूर्ति को गले में चुभना शुरू किया
शोषण के लिये दी गहरी सजा
बदबू देकर लिया सताने का मजा
तो हर हालत में
दांत किटकिटाये
डरावनी सर्द रातों मे
या नफरत के गर्म अंगारों में ।
- हरिहर झा
अक्टूबर 1, 2006
शरद
पत्नी के इरादे सी पाषाण
बस, नाराज हो कर देती कंपकंपी
बेरुखी ऐसी
जैसे निश्चल हवा का स्पर्श – गुमसुम
तीर की तरह घुसती
शिकायती फुसफुसाहट कानो में
तूफानी चाल से
तुषार की माला यों फॆंकी
बिखरा दिये कीमती सफेद मोती
अब सन्नाटा चुभ रहा सुइयों की तरह
कब पिघलेगा मौसम का हृदय ?
घेर लिया उच्छवास ने
धुंधलके में
कोड़े सी लगती शीतलहर
और तभी
लाल कपोलों पर रसीले ओंठ
आमंत्रण देते
गरमाहट की बाहों में आलिंगन करने
दहकती सांस मिल गई प्रेम की
क्या समझूं इसे?
कि मैं, शरद और अलाव
याने
पति पत्नी और वो !
– हरिहर झा
अक्टूबर1, 2006
http://www.hindinest.com/kavita/2005/173.htm
मित्र !
मित्र !
हम तो चले थे
उस नकली
और मशीनटाइप जिन्दगी से दूर
बाइसिकल उठाये
सैर पर
सारी औपचारिकताओं को छोड़ कर
दिल की बात करने
पर ट्यूब टायर मे फंसे कांटे
दुख अपना कैसे बांंटे
मित्र !
हम तो चले थे
अंर्तमन की लिप्सा को
सुरों मे बांधते हुये
शरमलोकाचार की दीवार लांघते हुये
फूहड़ फिल्मी गीतों से गला फाड़ते हुये
बेसुरे राग मे
अब सुनसान
इस नदी किनारे बैठ कर
अगर रोया या गाया
तो हंस पड़ेगी
हमारी ही छाया।
मित्र !
बहुत हो गई
मीठी कोयल की तान
खूब कर लिया
खुले आसमां का बखान
प्रकृति मे एकरूप होने का दावा
मानसिक शांति का बहलावा
कच्ची और कांटेदार सड़क पर
धूल फांकते हुये
अब पैदल ही चलो
भीष्म बनी कांटो से बिद्ध
साइकिल रगड़ कर
थोड़ा गुस्से से भड़क कर
पर थोड़ा
मन ही मन बिगड़ते हुये
अब वापस चलो मित्र <
-हरिहर झा
15 अप्रेल 2004
मित्र! हरिहर झा पुरस्कृत
http://www.hindinest.com/kshala/014/14ks3.htm
निकल कन्दराओं से
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
वात्स्यायन के कामसूत्र सूरतुलसी मीरा के पद
सोंच रहा नवनीत ज्ञान का पास है फिर भी दूर
पा न सकूं पर यत्न किये जाने पर हूं मजबूर
जीवन क्या? मृत्यु क्या? क्यों बन्धन हैं इस काया के
मोक्ष मिले तो कैसे? कब चक्कर छुटें माया के
अहं ब्रह्म को याद किया दिल हुआ हर्ष से गद्गद्
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
देवपुत्र होने का मुझको चढ़ा कभी अभिमान
डारविन की खोज कहे मै बन्दर की संतान
त्यागतपस्या ब्रर्ह्मचय को जब आदर्श बनाया
खगमृग जैसी कामवासना फ्रायड ने बतलाया
कीटपतंगो़े सा नरजीवन नीत्शे ने कर दी हद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
कहां ज्ञान को सरल बनाने रामकथा रच डाली
रामराम रट छुरी बगल मे बस आडम्बर खाली
शब्दों के रेशों की डोरी खुद को बंधता पाया
हर पुस्तक जंजीर बनी कारागृह मन को भाया
पोथी लिख लिख हुआ मुझे लो ब्रह्मा होने का मद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद।
-हरिहर झा
अगस्त 15, 2005
मदिरा ढलने पर
नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।
प्यास बुझाने पानी मांगा
अमृत की अब चाह नहीं
नन्हा दीपक साथ मे हो
आवश्यक जगमग राह नहीं
मौत आये यों सजधज कर
फिर र्स्वगलोक मे क्या होगा
नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।
दुनिया मे नहीं कोई पराया
सब के सब अपने देखे
सबकी यादें मीठी मीठी
फिर मिलने के सपने देखे
क्या खूब लुभाती मृगतृष्णा
तृप्ति मिलने पर क्या होगा
नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।
निंदक नियरे पानी बन कर
चित साफ करें धोयंे विकार
शत्रु भी कर दें सावधान
हों पग बढ़ने को जब तैयार
खलनायक मे जब राम छिपा
प्रभु प्रगट हुये तो क्या होगा
नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।
कांटे भी रक्षा करने को
तैयार खड़े हैं होशियार
फूलों का उपवन क्यों चाहूं
हर कलि सुगंधित है अपार
जुगनू की जगमग अति सुन्दर
पूनम की रात मे क्या होगा
नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।
-हरिहर झा
मई 1 2005
बन कविता मुस्कुराती
मन मे पीड़ा जब सताती,
बन कविता मुस्कुराती
दुख बने दो तट अधर के
प्यार की वाचा निकलती
थपेड़ों मे बन गई पतवार
जिव्हा सी मचलती
शांत कर ले मनगगन
मंझधारभंवरों मे सीखाती
मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती
एटमी हथियार चुपचुप
कौन पागल या दिवाना
युद्ध मे लोरी सुनाता
स्तब्ध रह जाता जमाना
शोले उगलती तोप कैसे
शान्त रह कर फूल उगाती
मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती
सौम्य तो कभी वीररस
श्रृंगार से सजती सजाती
बन विदुषक वेदना को
पी सदा हन्सती हन्साती
घाव पर मलहम लगा कर
विश्व को करुणा सीखाती
मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती
यातना के शिविर मे जब
नर बने कीड़ेमकोड़े
शहीदों की याद में
गाती कविता हाथ जोड़े
प्रेरणा देकर दिलों मे
ज्योति की माला सजाती
मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती।
-हरिहर झा
मई 1 2005