कैसे मन की अगन बुझे
राख मे शोल़े़, जलन तुझे
झुलसी लपटें क्यों सह कर
मौन मुखर!
दिल बोले हर अंग जले
वाणी सरगम की निकले
सांसे चुपचुप क्यों डर कर
मौन मुखर!
नभमण्डल के तारे मौन
जग की वाचा सुनता कौन
मानव आहें भरभर कर
मौन मुखर!
भाव भरी कविता गढ़ कर
सुरलय की सीढ़ी चढ़ कर
दिव्य साधना मे गल कर
मौन मुखर!
मौन शुन्य से निकली सृष्टि
ब्रह्मज्ञान की अनुपम द्रष्टि
मोक्षद्वार पर पहुंचेगा नर
मौन मुखर!
जीवन से कुछ राहें निकली
पर जिस दिन अर्थी निकली
प्राणो के स्वर हुये मुखर
मौन मुखर!
-हरिहर झा
(संगीत-रूप में उपलब्ध)
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm
पाषाण हो चुका यह हृदय
जिससे चट्टाने आपस मे टकरा कर
चूर होती
बह रही नदियों मे
पर अब भी
कोपले खिलने का अंदेशा
चिडि़यों के चहचहाते स्वर
सुनने की उत्कंठा
और फुलों से महकती
सुगंध के स्वप्न अभी बाकी ।
किसीने अपनी तलवार से
बंजर धरती पर
चीर दी अंतडि़यां
पर गरजते धमकाते बादलों मे
करुणा की गुंजाईश अब भी बाकी
निष्ठुर धरती से
भावुक संवेदना उपजने की आशा
अब भी बाकी
मुर्दा आसमान से
जीवनशक्ति बरसाने की
अपील अब भी बाकी ।
रुहानी प्यार की कोई जगह नहीं
क्योंकि अब प्यार हो चुका है एक
सौदा
गणित का एक समीकरण
या एक कंप्यूटर प्रोग्राम
कुछ तत्वों का बहता हुआ रसायन
कीचड़ के इस फैलाव मे भी
कमल खिलने की
उम्मीद अब भी बाकी।
-हरिहर झा
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm
खोईखोई उलझनो का कुछ तो राज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है
झांझर झमझम बजी सृष्टि का मूल
तारे ग्रह नक्षत्र चितवन की धूल
मेघ कालेछिद्र से नैन के काजल
युगयुगान्तर निकल गये कि जैसे पल
कल से बहते आंसुओं का समन्दर आज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है
राजकुल की मर्यादा सबको भाई
भोली सी प्रेमलहर जा टकराई
क्या बला है ! प्राण किसलिये अटक गये
प्रमुख जिन्हें राजधर्म क्यों भटक गये
छोड़ दिया तख्त छोड़ दिया ताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है
शरमा कर झुकी हुई नजर की हाला
चिन्गारी प्रेम की वियोग की ज्वाला
धधकते अंगार सा खून जब बहा
तड़पता सिसकता दिल मौन ही रहा
खुल कर रोने के लिये मोहताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है।
-हरिहर झा
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm