फ्रायड ने देखा एक ख्वाब
मनुष्य जाति
जो मनोरोगों से ग्रस्त
मानसिक विकारों से त्रस्त
कैसे जगे बीमारी को
दूर भगाने की आस
हो हर ताले की
कुंजी उसके पास
फिर सपने मे देखा
झोली या डंडा
मुर्गी या अंडा
अंडे का फंडा
प्रत्येक का जरूर कोई अर्थ
लाठी नाग तलवार या चाकू
कूआ, खाई, पहाड़ या राई
सब कुछ यौन पिपासा
सर्व सेक्समयं जगत
सदा से भीतर की कुण्ठायें रोई
जब चेतन मन बिल्ली की नींद सोया
दमित वासऩा का चूहा
चुपचाप
अपना भेष बदल कर निकला
मानो फ्रायड ने
चतुर बिल्ली की तरह
नींद का ढ़ोग रच कर
जान लिया चूहों का राज।
दंग रह गया फ्रायड
मन की गहराईयां बतलाते
ये सपने कितने सच्चे !
कि जैसे निरदोष बच्चे
बाकी झूठा इंसान
झूठी यह दुनियां।
Part II : Do you like ‘Shaayari in English’ ? Click on:
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/10/i-am-silent/
OR
http://hariharjha.wordpress.com
नदी की बूंद सा बहता लम्हा
हुआ ना तिजोरी मे कैद लम्हा
ख्यालों पे जीवन लुटाता रहा
जीत हार बदले मे पाता रहा
हथेली पे सरसों उगाई जीवन भर
न मरने की आशा जुटाई जीवन भर
टिक टिक घड़ी की सुनाता लम्हा
सपनो के जाले बुनाता लम्हा
काटे न कटता समय यों अकेले
लगा पंख उड़ता भर बीच मेले
तन्हाई गमो की कब बोल पाई
हंसती गाती राहें सब को भाई
चुप चुप चले बोर करता लम्हा
घेरे खुशी शोर करता लम्हा
नाटक जग का प्यारनफरत लाये
ना जाने किस क्षण र्पदा गिर जाये
चेतना का दीपक जलाता तिल तिल
तो भी यह चक्रव्यूहभेदन मुश्किल
परतदरपरत प्याज खुलता लम्हा
तीखी कुछ मीठी गन्ध देता लम्हा।
For “My Mistress!”
http://hariharjha.wordpress.com/
OR
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/my-mistress/
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला
रोज वही सूरत घर में घर वाली
बांछॆ खिली देख आधी घर वाली
साली को देखा बिगङ गया साला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।
रिश्वत दी रोकड़ा तो भी क्या पाया,
थाने में जा उसने सच-सच बताया।
किस बेवकूफ से पड़ गया पाला,
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला
बहन की शादी निकाले कुछ जेवर ;
सट्टा लगाया बिगड़ गये तेवर।
अम्मा ने डांटा बिगड़ गई खाला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।
चुनाव से पहले दिये जिनको नोट,
वे ही दे आये विरोधी को वोट;
वोटर की बुद्वि को पड़ गया ताला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।
मानपत्र लेने की जुगत भिड़ाई,
पोल खोल मीडिया ने बहस छिड़ाई
पहनाई गले में जूतों की माला,
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।
–हरिहर झा
2nd poem on:
http://shabdanjali.com/srujan/ujala20005.htm
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल
बोर हुई इस दुनिया में तू मजा उन्हें भी देता चल।
अपनी बात को ऊंची रखे वो ऊंचा कहलायेगा
सब से कट कर निपट अकेला तपस्वी बन जायेगा
भूले भटके कोई अगर तुझे पूंछने आ जाय
जूते सिर पे रख ले फिर भी नहीं भागने पाये
बकझक करके गला पकड़ ले खरी खोटी सुनाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।
मिले लड़ाई का अवसर तो दुश्मन से भी यारी हो
शांति ऎसी दो पल में बस लड़ने की तैयारी हो
समझ कि तेरे मधुर वचन बस गाली की तैयारी हो
फूलों की माला में खंजर चल जाने की बारी हो
फटे में बन्धु टांग अड़ा ले दुश्मन बन भिड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता च॥
भले लोग चुपचाप भला करने का बीड़ा उठायें
नियम बता दे इधर उधर के कुछ भि न कर पायें
काम नहीं केवल भाषण बाजी के अवसर चुनना
सीधी सच्ची बत कहे कोई तो कभी न सुनना
लम्बी बहस किये जा सबमें अपनी टांग अड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।
-हरिहर झा
http://shabdanjali.com/kavita/harihar%20jha.htm