हरिहर झा

October 24, 2007

फ्रायड ने देखा एक ख्वाब

फ्रायड ने देखा एक ख्वाब

मनुष्य जाति

जो मनोरोगों से ग्रस्त

मानसिक विकारों से त्रस्त

कैसे जगे बीमारी को

दूर भगाने की आस

हो हर ताले की

कुंजी उसके पास

  

फिर सपने मे देखा

झोली या डंडा

मुर्गी या अंडा

अंडे का फंडा

प्रत्येक का जरूर कोई अर्थ

लाठी नाग तलवार या चाकू

कूआ, खाई,  पहाड़ या राई

सब कुछ यौन पिपासा

सर्व  सेक्समयं जगत

सदा से भीतर की कुण्ठायें रोई

जब चेतन मन  बिल्ली की नींद सोया

दमित वासऩा  का चूहा

चुपचाप

अपना भेष बदल कर निकला

मानो फ्रायड ने

चतुर बिल्ली की तरह

नींद का ढ़ोग रच कर

जान लिया  चूहों का राज।

दंग रह गया फ्रायड

मन की गहराईयां बतलाते

ये सपने कितने सच्चे !

कि जैसे निरदोष बच्चे

बाकी झूठा इंसान

झूठी यह दुनियां।

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August 30, 2007

लम्हा

Filed under: तुकान्त, शब्दान्जलि — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:46 am

नदी की बूंद सा बहता लम्हा
हुआ ना तिजोरी मे कैद लम्हा

 

ख्यालों पे जीवन लुटाता रहा
जीत हार बदले मे पाता रहा
हथेली पे सरसों उगाई जीवन भर
मरने की आशा जुटाई जीवन भर

   

टिक टिक  घड़ी की सुनाता लम्हा
सपनो के जाले बुनाता लम्हा

 

काटे कटता समय यों अकेले
लगा पंख उड़ता भर बीच मेले
तन्हाई गमो की कब बोल पाई
हंसती गाती राहें सब को भाई

 

चुप चुप चले बोर करता लम्हा
घेरे खुशी शोर करता लम्हा

नाटक जग का प्यारनफरत लाये
ना जाने किस क्षण र्पदा गिर जाये
चेतना का दीपक जलाता तिल तिल
तो भी यह चक्रव्यूहभेदन मुश्किल

 

परतदरपरत प्याज खुलता लम्हा
तीखी कुछ मीठी गन्ध देता लम्हा।

For “My Mistress!”

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February 14, 2007

अंधेरा

Filed under: तुकान्त, मंच, व्यंग्य, शब्दान्जलि — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:10 am

अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला

रोज वही सूरत घर में घर वाली
बांछॆ खिली देख आधी घर वाली

साली को देखा बिगङ गया साला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

रिश्वत दी रोकड़ा तो भी क्या पाया,
थाने में जा उसने सच-सच बताया।

किस बेवकूफ से पड़ गया पाला,
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला

बहन की शादी निकाले कुछ जेवर ;
सट्टा लगाया बिगड़ गये तेवर।

अम्मा ने डांटा बिगड़ गई खाला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

चुनाव से पहले दिये जिनको नोट,
वे ही दे आये विरोधी को वोट;

वोटर की बुद्वि को पड़ गया ताला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

मानपत्र लेने की जुगत भिड़ाई,
पोल खोल मीडिया ने बहस छिड़ाई

पहनाई गले में जूतों की माला,
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

–हरिहर झा

2nd poem on:

http://shabdanjali.com/srujan/ujala20005.htm

मित्रों से झगड़ता चल

Filed under: मंच, शब्दान्जलि, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:04 am

मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल
बोर हुई इस दुनिया में तू मजा उन्हें भी देता चल।

अपनी बात को ऊंची रखे वो ऊंचा कहलायेगा
सब से कट कर निपट अकेला तपस्वी बन जायेगा
भूले भटके कोई अगर तुझे पूंछने आ जाय
जूते सिर पे रख ले फिर भी नहीं भागने पाये

बकझक करके गला पकड़ ले खरी खोटी सुनाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।

मिले लड़ाई का अवसर तो दुश्मन से भी यारी हो
शांति ऎसी दो पल में बस लड़ने की तैयारी हो
समझ कि तेरे मधुर वचन बस गाली की तैयारी हो
फूलों की माला में खंजर चल जाने की बारी हो

फटे में बन्धु टांग अड़ा ले दुश्मन बन भिड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता च॥

भले लोग चुपचाप भला करने का बीड़ा उठायें
नियम बता दे इधर उधर के कुछ भि न कर पायें
काम नहीं केवल भाषण बाजी के अवसर चुनना
सीधी सच्ची बत कहे कोई तो कभी न सुनना

लम्बी बहस किये जा सबमें अपनी टांग अड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।

-हरिहर झा

http://shabdanjali.com/kavita/harihar%20jha.htm

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