मै जब खाली पेट था
भूखा ! सिर्फ भूखा !
नहीं जानता था
क्या होता है सिर दर्द
दिल मे लिये फिरता था
सिर्फ प्यार का दर्द
हाँ अब, जब खट्टी डकारे लेता हूं
कल का भोजऩ कोई छीन न ले
इस चिन्ता मे व्यस्त रहता हूं
तब चुभ रहा है तीर
दर्द से फटा जाता है सिर ।
पर कहते हैं इस युग में
दर्द को संवेदना नहीं
अनुभूति नहीं
बिल्कुल जड़ समझो ।
किसी सड़े हुये सेव की तरह
या गले मे अटकी गोटी की तरह
वस्तु समझो और
गोली खाकर
गोटी को निकाल फेको ।
तो गुब्बारा हुये इस पेट का दर्द
लगता है सड़ा हुआ सेव
न्यूटन से पुछ कर
सिर से गिर कर
पेट मे उतर आया
सेव फट कर
ज्यों मिट्टी मे मिला
शुरू हुआ बदन दर्द ।
आखिर यह दर्द है क्या !
बस, काया से मस्तिष्क तक
न्यूरोन से गुजरती यात्रा ।
न्युरोन को पकड़ा पर
दर्द कहां पिट पाया
बिजली को धूल माना
पर दर्द कहां मिट पाया ।
-हरिहर झा
http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time5.html
नोट: भॊतिकी जानने वालों के लिये:
बिजली को धूल माना
= तरंग को कण माना = wave को particle माना
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संपादकीय टिप्पणी :
हरिहर झा की कविता द्वन्द्व के उस दर्द को बयान करती है जो अपनी जमीन से
कटने और सुविधा से जुड़ने के बावजूद कहीं ना कहीं अन्तर्मन में टीस देता रहता
है। आस्ट्रेलिया मे विस्थापित हरिहर झा ने अपनी इस ताकत को कचरे की टोकरी
मे डाल दिया था यह सोंच कर कि ये कवितायें नींद की गोलियों की तरह सुला देने
वाली आज की कविताओं के स्वाद की नहीं हैं । किन्तु कृत्या के आग्रह पर वे
अपनी बरसों पुरानी सोंच के साथ उपस्थित हुये हैं।
घोड़े
घोड़े महत्वाकांक्षाओं के
उंची उंची लालसाओं के
भागते हुये
सरपट मैदान की बात ही क्या
चढ़ भी जाते हैं सीडि़यों पर
भले ही पैर लहूलुहान
कभी तो दुनियावी बोझे से लदा तांगा
कंधो पर उठाये
आकाश मे उड़ते हुये
भावना के परिन्दो को
नीचा दिखाते हुये¦
ये घोड़े दे गये मुझे
अथाह शक्ति, धन दौलत
ईर्ष्या मित्रो की
गालियां दुश्मनों की
अजनबियों की व्यंग्यमय मुस्कान
सब कुछ पा लिया
अपने ही बलबूते पर याने
बलपूर्वक इस घोड़े के बूते पर
सब कुछ पा लिया
अपने स्वयं की पूर्णाहूति देकर
मेंने
अश्व नहीं
नरमेध यज्ञ मे
घोड़े को किया
यशस्वी विजयी कीर्तिमान ।
-हरिहर झा
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चलो फिर
इस दिखावे के
यंत्रवत् जीवन से दूर
पिकनिक पर
संगी साथियों की टोली ले कर
समस्त औपचारिक वेशभूषा को तिलांजलि देकर
हंसी ठिठोली करते हुये
गुपचुप ही वहां पूरे लंचडिनर की व्यवस्था के बाद भी
चना चबेना ढुंढने का स्वांग रचते हुये ।
चलो फिर
फिल्मी र्तज पर गीतों से गला फाड़ते हुये
आदिवासी लोकगीतों की तरह
या फिर आर्यों द्वारा गाई
वैदिक ऋचाओं की तरह
सामुहिक अंतर्मन को सुरों में
अभिव्यक्त करते हुये
कुछ दुर बुशवाक पर निकल कर
राह भटकने का ढोंग कर लेने के बाद
मोबाइल पर संपर्क करते हुये ।
चलो फिर
कड़कती ठन्ड मे
गरम आंच का लुत्फ लेने
कोयले की
अंगीठी पर हाथ सेंकने के लिये
अंगीठी मे छुपे हीटर का
स्वीच आन करते हुये।
चलो फिर
वृक्ष, प्रकृति, चांदतारों की
सुन्दरता का बखान कर
इन सबसे
मन शांत कर लेने की डिंग हांकने के बाद
जरा सी बात पर भड़क कर
मन ही मन भुनभुनाते हुये
चलो फिर
चले??????
- हरिहर झा
5th poem:
http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time.html