हरिहर झा

November 21, 2007

पतझड़ी-वसन्त

Filed under: अतुकांत, अनुभूति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:22 pm
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दुनिया वालों, सुनो सुनो
खूब मजे लो वसन्त ऋतु के
पर कुछ हमारी भी सुनो।
भारत क्या और चीन क्या
यूरोप और अमरिका क्या
“या निशा सर्वभूतानां”
जब सारी दुनिया
पसीने से तरबतर
तब हम ऑस्ट्रेलियावासी
लिहाफ ओढ़ते हैं
हीटर चलाते हैं
जब दुनिया ठन्ड से थर थर कांपती
तब हमें दिखते हैं ‘सी-बीच’ पर
अर्धनग्न नजारे
दिल कहे न…जा …ऱे …।

सिलिकन वेली के खिलते सुमन
और भारत के
अनजान कस्बे की कोयल
कंप्यूटर के वेबकेम पर
सुर में सुर मिलाती हैं
“वसन्त आया”
तब मेरी खिड़की से बाहर
सूखे पत्ते आवारा पशुओं की भांति
एक दूसरे पर गिरते हुये
भटकते हैं
तब जी चाहता है
सिर अपना सड़क पर
ठोक ठोक कर उल्टा चलुं
पैरों से सोच सोच कर
दिवाली में खेलुं फाग
और होली में पटाखें छोडूं
क्योंकि हम तो
ऑस्ट्रेलियावासी
धरती के निचले गोलार्ध में
मकड़ी की भांती
पैर जमीन से चिपका कर
उल्टे चलते हैं।

 -हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_02/02_04pravishtiyan4.htm#hj

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November 14, 2007

धरा पर गगन

Filed under: अनुभूति, गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:24 pm
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खुशियों की बौछार खिलखिलाता मौसम आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

देवालय पर पूर्ण चन्द्रमा अनहोनी यह बात
दीप जल रहे लगता निकली तारों की बारात
फुलझडि़यों की माला निहारिकाओं का आभास
फूट रहे पटाखे बम चलते कदमों के पास

युवकों की शरारत मस्ती का आलम छाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

चरणों में लक्ष्मी मैया के झुक झुक जाता माथ
मिठाइयां सूखे मेवे ले लेते भर भर हाथ
भागे दुख जंजाल छा गई दीप पर्व की माया
गोल घूम रहे ग्रह नक्षत्र स्वर्ग यहां लो आया

इन्द्रलोक की उर्वशी का नृत्य उतर आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया

खेल रहे खिलौनों से बन वायुयान के चालक
नई नई पौशाक अकड़ते खेल रहे हैं बालक
इन्तजार था महिनों से कि कब आये दिवाली
लटक मटकते झूम बजाते दो हाथों से ताली

तोतली बोली शिशुओं की  कितना आनन्द समाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया।

 - हरिहर झा

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Smiled the Sun :

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October 31, 2007

प्रिये तुम्हारी याद

Filed under: अनुभूति, गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:15 pm
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प्रेम पाशमय जीवन सुना कर जाने के बाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
झिलमिल स्मृति चित्र उभरते और सताते मुझको
अकुलाए से पंथ प्यार की राह जताते मुझको
झूम रहे वे नयन चकोरे मुस्काते फूलों में
झुला रहे मदभरे प्यार से हिलमिल के झूलों में

  
स्वर मधुर सब तेरे लगते सुन विहंग के नाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
व्यथित नयन बस जगे जगे से एक झलक की आस
रूप गंध कुछ स्पर्श  नहीं इस तनहाई के पास
स्वप्नों में जी भर देखा पर बुझी न उर की प्यास
दिवास्वप्न बुन बुन  कर मेरी पीड़ा बनी उदास

  
सहा न जाता एकाकी पल घिर आया अवसाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

       -हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/priye.htm

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September 13, 2007

खिलने दो खुशबू पहचानो

Filed under: अनुभूति, तुकान्त, मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:06 am

विषम स्थिति हो लोग पराये फिर भी सब मे ईश्वर जानो
भांति भांति के फूल जगत मे खिलने दो खुशबू पहचानो

 

अन्तरिक्ष में ज्वाला भड़की चांद सितारे अस्त हुए
महाकाल ने डेरा डाला देवलोक भी ध्वस्त हुए
शीत लहर में आहें सिसकी कैसा यह हिमपात हुआ
चरम अवस्थाओं के झूले घात गई प्रतिघात हुआ

 

कहा धरा ने संयम बरतो देखो जीवन को पहचानो
बगिया बोली कली प्यार की खिलने दो खुशबू पहचानो

 

धर्म मार्ग पर यथा बाल शिशु किलकारी भरते जाते
भक्तिभाव का रस पी पी कर आनंदित होकर गाते
छन्द ताल मे बहे नदी उन्मुक्त बहे गति से झरना
शब्द ब्रह्ममय जगत यहां बिन दाग चदरिया को धरना

 

पोंगा पंडित इतराया तुम वेदशास्त्र को क्या जानो
कहा जगत ने अरे इन्हे भी खिलने दो खुशबू पहचानो

 

जंजीरों मे घिरी नारियां हुई स्वतन्त्रता बेमानी थी
देवी कह कर फुसलाया शोषण की नीति ठानी थी
सूत्रपात हो क्रान्ति काआधीदुनियांको होश हुआ
प्रगति पथ पर अधिकारों की समता का उद्घोष हुआ

 

भोग्या नहीं, नहीं अबला है स्त्रीशक्ति को पहचानो
प्रेमस्रोत के फूल महकते खिलने दो खुशबू पहचानो 

 

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_03/03_04pravishtiyan3.htm#hj 

 

For “Hunger - 3 Faces: (  Which one is 3rd Face?) 

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August 2, 2007

रिमझिम यह बरसात

Filed under: अनुभूति, तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:17 am

 मनमयूर लो नचा गई
रिमझिम यह बरसात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौगात
 
भीगा सावन प्यार मे
जल मे भीगा बदन
सजनी साजन से करे
कैसे प्रणयनिवेदन?
 
छमछम पायल बज उठे
चूड़ी बजती खनखन
बोल नहीं पाते अधर
झूमता आया पवन
 
कानों में कुछ कह गया
प्यारीप्यारी बात
मनमयूर लो नचा गई
रिमझिम यह बरसात
          * 
पिया बिना बरसात मे
काटी रतियां जाग
वेणी फूलों से लदी
डसती जैसे नाग
 
अंगारों सा क्यों लगे
हराभरा यह बाग
तन जल मे मन जल उठे
पानी मे यह आग
कांटे दिल तक ना चुभे
दी गुलाब ने मात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौग़ात
        * 
डूब गया घरबार सब
बहा गई लंगोट
किया बसेरा फटी हुई
चादर की ले ओट
 
हेलीकोप्टर आ गए
नेता मांगे वोट
आंसू मगरमच्छ के
दिल पर करते चोट
  
फंड हजम कर रो रही
जनता को दी लात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौगात।
- हरिहर झा
 

 http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/varshamangal/sets/41aug.html
 

July 26, 2007

न जाने क्यों

Filed under: अतुकांत, अनुभूति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:00 am

भूख से कराहते बालक को देख कर
न जाने क्यों
मेरे हाथ
उसे रोटी देने के बदले
दार्शनिक गुत्थी मे उलझ गये 
कि भूख क्या है और दुख क्या
शरीर क्या है और आत्मा क्या ?

निरीह अबला को
घसीट कर ले जाते देख कर
न जाने क्यों मेरी आंखे
उस दो हडि्डयों वाले पापी को 
शर्म से डुबाने के बदले
विचार मे खो गई कि यहां
मजबूर कौन है और अपराधी कौन 
प्यार क्या है और वासना क्या ?

 

साम्प्रदायिक दंगे मे 
जिन्दा छुरियों और कराहती लाशों के बीच
चीत्कार सुनने के बदले
न जाने क्यों मेरे कान
दुनियादारी का नाम देकर 
ओछेपन की दलदल मे उतर गये 
यहां हिन्दू कौन है और मुसलमान कौन
अपना कौन है और पराया कौन ?  

 

बांध का छेद बुदबुदाते देख
न जाने क्यों 
मेरे पग 
सुप्त तत्रिंयो और ऊंघते दरवाजों को 
भड़भड़ाने के लिये 
भागने के बदले 
विप्लव के आह्वान मे डूब कर
प्रलय की कल्पना करने लगे 
कि अब 
मनु कौन है और कामायनी कौन 
सृष्टि क्या है और वृष्टि क्या ?  

 

न जाने क्यों 
क्यों और क्यों ?
मेरे आंख कान हाथ पग 
सब के सब दिमाग हो गये हैं 
और दिमाग
इन धूर्त बाजीगरों की कठपुतली ।

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/na_jaane.htm

February 26, 2007

पतझड़*

Filed under: अनुभूति, तुकान्त, मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:15 am

 -हरिहर झा

आंसू मे डूबी वीणा ले मधुर गीत मै कैसे गाता
बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता

खेलकूद सब बेच दिया बस दो पैसों के खातिर
बहा पसीना थका खून खाने को तरस गया फिर
गिरवी रख कर बचपन मजदूरी से जोड़ा नाता
शाला कैसे जा पाता जब रूठा हाय< विधाता

तरस गया देह ढंकने को यूनिफार्म कहां से लाता
बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता

बस्ता लिये चला स्कूल मै सपना ऐसा देखा   
सोने के मेडल से चमकी अरे! भाग्य की रेखा
दिनभर शरीर झुलसाने के झगड़े हो गये दूर
भोंपू बजा कान मे मेरे सपने हो गये चूर

कैसे भूखा रह कर र्खचा फीस किताबों का कर पाता
बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता

किस्मत ऐसी कहां कि हंस कर किलकारी मैं भरता
रोज बाप की गाली खाकर पिट जाने से डरता
कैसे अपने आंसू पोछूं  नरक बना यह जीवन
गुमसुम सोच न पाता कैसे दुख झेले यह तनमन

मां बूढ़ी बीमार खाट पर उसे खिलाता क्या मै खाता
बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता।

1 जून 2005

*(संगीत-रूप में उपलब्ध)

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/patjhad.htm

http://narad.akshargram.com/archives/author/harihar-jha/

February 18, 2007

मां की याद

Filed under: अनुभूति, तुकान्त, मंच, साउथ एशिया टाइम्स — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:56 am

मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई
पंचतारा होटलों की शान शौकत कुछ न भाई

  
बैरा निगोड़ा पूछ जाता किया जो मैंने कहा
सलाम झुकझुक करके मन में टिप का लालच रहा
खाक छानी होटलों की चाहिए जो ना मिला
करोध मे हो स्नेह किसका?  कल्पना से दिल हिला

प्रेम में नहला गई जब जम के तेरी डांट खाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई

तेरी छाया मे पला सपने बहुत देखा किए
समृद्धि सुख की दौड़ मे दुख भरे दिन जी लिए
महल रेती के संजोए शांति मैं खोता रहा
नींद मेरी छिन गई बस रात भर रोता रहा

चैन पाया याद करके लोरी जो तूने सुनाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई

लाभ हानि का गणित ले जिंदगी की राह में
जुट गया मित्रों से मिल प्रतियोगिता की दाह में
भटका बहुत चकाचौंध में खोखला जीवन जिया
अर्थ ही जीने का अर्थ, अनर्थ में डुबो दिया

हर भूल पर ममता भरी तेरी हंसी सुकून लाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई।

 -हरिहर झा
16 मई 2006

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mamtamayi/maakiyaad2.htm

February 16, 2007

चुप हूं

Filed under: अनुभूति, मंच, शेर, साउथ एशिया टाइम्स — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:06 pm

खुल कर रोया था जनमने के बाद
हालात अब ये है कि बरसों से चुप हूं।

अंदाज़े-बयां था कातिल का जुर्म किसका है
सामने उसके उसका नाम लेने से मैं चुप हूं।

भूखा पेट मेरा और डकार लेने को कहा
चूहा पेट का न दिख जाय इसलिए मै चुप हूं।

सोचा था हंस हंस कर पियेंगे ग़म के आंसू
सैलाब ग़म का आया इसलिए मैं चुप हूं।

दिल से दरिया-ए-इश्क बहा देने के बाद
कहा कि अब अश्क बहा इसलिए मैं चुप हूं।

घाव पर मलहम के बदले नमक छिड़का
ये भी क्या कम है खुदा कि मैं चुप हूं।

गुनाह बहाना बना नए गुनाह करने को
फंसा दलदल मे पर ये तमाशा कि मैं चुप हूं।

क्या बोलूं जब पूछा खुदा ने गुनाहों का सच
सच केवल इतना ही कि तू पूछे और मैं चुप हूं।

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/chup.htm

प्रीत के गीत

Filed under: अनुभूति, तुकान्त, मंच — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:57 pm

कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी
दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा
चांदनी श्वेत परिधान से सज गई
खिलखिलाता पवन छेड़ता ही रहा

इठलाती डालिया मन्द मन्द झूलती
दो हृदय बांध कर गुदगुदाने लगी
सरिता भी कलकल का स्वर सजाती हुई
छलछल के नाद से गीत गाने लगी

पेंजनिया छमछम बजने बजाने लगी
अवनि के हृदय में ज्वार उठने लगा
कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी
दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा

आया मधुमास अब कलियां बोराई
प्यार के वार में छटपटाने लगी
वसन्त आया तो बहकती झुमती
मदिरा के प्यालों सी डगमगाने लगी

बिंबों प्रतिबिंबों के चंचल से चितवन मे
सृष्टि का सूर्य भी मुस्कराने लगा
कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी
दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा

दूर किसी प्रेम मन्दिर के देव की
सुमधुर घंटियां झनझनाने लगी
नृत्य करती रति मृदंग की थाप पर
मधुकर के गीत की धुन सुनाने लगी

ताल गंुजती हुई लय डुबाती हुई
तन थिरकता रहा मन चहकने लगा
कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी
दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_02/02_04pravishtiyan6.htm#hj

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