हरिहर झा

मई 1, 2012

लिखना बाकी है

Filed under: गीत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:40 पूर्वाह्न
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शब्दों के नर्तन से शापित
अंतर्मन शिथिलाया
लिखने को तो बहुत लिखा
पर कुछ लिखना बाकी है

रुग्ण बाग में पंछी घायल
रक्त वमन जब बहता
विभत्स में शृंगार रसों की
लुकाछिपी खेलाई
विद्रोही दिल रोता रहता
दर्द बहुत ही सहता
फिर भी लफ्जों को निचोड़ कर
बदबू ही फैलाई
खाद समझ नाले से मैंने
कीचड़ तो बिखराया
किन्तु हाय! गन्ध फूलों की
बिखराना बाकी है।

साफ करूंगा वस्त्र भाव के
बचपन में कुछ सोंचा
किन्तु आज तक मैले कपड़े
धूल हटा ना पाया
दुर्गंध भरे, बिखरे बालों
को कितना भी नोचा
निर्मल करे सुभाये ऐसा
कुछ भी लिख ना पाया
ज्योत जलाने चला भले ही
अंधकार में डूबा
अब तक घने तिमिर की परतें
खुल जाना बाकी है।

कागद ने खुश होकर नभ के
रहस्य खूब उभारे
स्याही में डूबा तो, अचरज
पंछी खुद को पाया
ले आई आकाश में कलम
दुबका डर के मारे
उड़ ना पाया मुक्त हवा में
गड्ढे में घुस आया
बहुत किया डबरे में छपछप
थक कर यों पछताया
सागर से उठती लहरों को
छू लेना बाकी है

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2012/04/blog-post.html

A Half Poet :

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=330

अगस्त 25, 2011

सपने में जो देखा

Filed under: अनुभूति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:51 पूर्वाह्न
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कुदरत का यह लेखा
सपने में जो देखा
सुबह वही तो समाचार है

ताक-झाँक की थी पड़ोस में
’विकिलिक्स’ अखबार में छाये
टपकी लार बनी ईंधन तो
भट्टी खुद ही जलती जाये

लावा बहे दनादन
रीता घट रोता मन
छपी खबर का यही सार है

गाली मन में दबी पड़ी थी
गोली बन कर निकल पड़ी है
ख़्वाबों में जो लाश बिछाई
मौत सामने तनी खड़ी है

दिवास्वप्न तो दूर
अंतस् का दर्पण चूर
भीतर गहरा अंधकार है |

-हरिहर झा
“नवगीत की पाठशाला” से साभार :

http://navgeetkipathshala.blogspot.com/2011/04/blog-post_19.html

Cheers or Jeers

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=446

जनवरी 27, 2011

खिलखिलाये

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:52 पूर्वाह्न

शोक में, उल्लास में
दो बूंद आँसू झिलमिलाये
देखकर प्यासे सुमन पगला गये और खिलखिलाये
*
साज़िश थी इक ,
सूर्य को बन्दी बनाने के लिये
जंजीर में की कैद किरणे
तमस लाने के लिये
नादान मेढक हुये आगे, राह इंगित कर रहे
कौशिशों में जूगनुओं ने चमक़ दी और पर हिलाये
देखकर नन्हे शिशु पगला गये और खिलखिलाये
*
बाद्लों के पार
बेचैनी भरी मदहोंश चितवन
देख सुन्दर सृष्टि को ना
रोक पाई दिल की धड़कन
भाव व्याकुल हो तड़ित सा काँप जाता तन बदन
मधुर आमन्त्रण दिये, निशब्द होठों को हिलाये
देखकर रूठे सनम पगला गये और खिलखिलाये
*
नृत्य काली रात में था
शरारत के मोड़ पर
सुर बिखरता , फैल जाता
ताल लय को तोड़ कर
छू गया अंतस
प्रणय का गीत मुखरित हो उठा
थम गई साँसे उलझ कर जाम लब से यों पिलाये
देखकर प्यासे चषक पगला गये और खिलखिलाए

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2011/01/blog-post_07.html

अगस्त 13, 2010

बुलन्द आवाज

Filed under: अतुकांत,आखर कलश — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:38 पूर्वाह्न
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चिढ़ाने का सा भाव
सपनीली आँखों से
देख कर
मैं अपने को पाता हूँ
आधा अधूरा
यह खालीपन …
जाने क्यों ?
ढूढंता हूँ
कुछ पाने के लिये
पर हाथ बढ़ा कर भी
रोक नहीं पाता
फिसलते क्षण;
विरान दिल को
डूबा देती हो अथाह सागर में
तुम्हारे धनुष-बाण घुस आते हैं -
दिल-दिमाग की तंत्रियां झंझोड़ कर
नग्न विचारों को एक झटका देकर
अनकहे भावों की बखिया उधेड़ कर
दे देती हो
एक तिनके का सहारा
जिसका आशय समझ नहीं पाता
मौन वार्ता सुन नहीं पाता
कुछ जान नहीं पाता
सिवा इसके कि -
आकाश से दुधिया चांदनी
जब रिसती हुई गीरती है
धरती के दामन पर
तो यह मदमस्ती बरगलाती
प्रलोभन देती
इसकी लहलहाती फसल
थामे हुये जो तुम खड़ी हो
यह तुम्हारे जिस्म से निकलती
बुलन्द आवाज है
रूह से निकलता
संगीत है

-हरिहर झा
http://aakharkalash.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html

http://hariharjha.wordpress.com/

जून 15, 2010

नाटक

Filed under: अतुकांत,आखर कलश — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:07 पूर्वाह्न
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समन्दर पार कंटीली झाड़ी के पीछे
झोपड़ी के आंगन में
भले सताती चिन्तायें और बढ़ती धड़कन
पर जहां मिलती थी
प्रेम की सौगात
चाहता तो ले लेता
हँसते हुये
लेकिन ठहराव से विद्रोह कर के
यहां तो फंस गया दुविधा में
धुंधलाई शाम में बीयर की बोतल खुलने पर
चांद ने
जब अंधियारे को चूमा
तो मेरी शान से सजाई हुई
बत्तियों को
अस्तित्व का खतरा नजर आया
मैंने मुँह बिचका लिया
तन गई एक एक नस
जिसकी थकान ही
लिख डालती सलवटें बिस्तर पर ।

जागते हुये देख रहा हूँ सपना कि
नींद नहीं आती डालर के नोटो पर
कितनी अच्छी थी बाजरे की रोटी
सरसों का साग
अब यहां पर
हर मुस्कान शिष्टाचार के विरुद्ध है
और खुश होने का अर्थ
देशद्रोह , एक घमन्ड, एक पाखन्ड
जो कविता की आत्मा के खिलाफ है
तो भीगो ले अपने तकिये
स्वार्थ पर प्रेम की और
देह पर आत्मा की जीत के लिये
भोग पर अध्यात्म की जीत के लिये
रोना न आये तो रो ले
ग्लीसरीन लगा कर !
समझ ले !
टपकते आँसू एक संस्कृति है ।
*******
http://aakharkalash.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html

Folly of the wisdom

http://hariharjha.wordpress.com/2007/11/08/folly-of-the-wisdom/

नवम्बर 9, 2009

रोना चाहता है

Filed under: मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:26 पूर्वाह्न
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गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है
ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है

ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता गया अब
बावला रे ! तु चैन से सोना चाहता है

कैद हैं सब टेन्शन टकराते मेरे भीतर
तेज जलता चिराग अब बुझना चाहता है

लुट गई तो न बच सकेगी धरती पे कहीँ
आबरू को डूबाके वो मरना चाहता है

हँस न पाया हँसी कभी मासूम सी जो
भटक कर फूल वो कहाँ बोना चाहता है

चाँद पर रात भर यों काला डामर टपकता
पाप धरती से जो हुये ; धोना चाहता है
-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/07/blog-post_17.html

her teasing face

http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/

 

अक्टूबर 19, 2009

निमन्त्रण

Filed under: अतुकांत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:39 पूर्वाह्न

कितना अजीब है !
मिलना निमन्त्रण
भूतपूर्व पत्नी की
शादी पर !!
जैसे कि
याद दिला दिया उसने
कैसे कैसे स्वप्न थे मेरे !
कि पत्नी भी बन पाये प्रेमिका
पर छोड़ो यार !
कहाँ की लजाती मुस्कान और
शौख अदाये!
नहीं बन पाई थी वह
रूक्मणी से राधा !

देना पड़ा था तलाक
क्योंकि मैं उसे
कैसे संभालता
जब वह छटपटा रही थी
बीमारी से
देख कर दिमाग धुँआता था कुहरे में
कि किसी गाय की रंभाहट लगता था
उसका चिल्ल्लाना !
उलझने क्या सुलझती
जब कोई एहसास नहीं हुआ
कि हो पाये सुलह हम दोनो में
पर खबरदार ! जो मुझे मक्कार, धूर्त समझा तो
पत्नी बीमार थी तो क्या
मैं उसका साथ देता !
हाँ , उस पर किये अहसानों के बदले
मैंने अपने पास रख ली है
हमारे शिशु की मासुम हँसी
चहकना, क्रन्दन और गुंजन
किस्मत से ले लिया मैंने
प्रतिशोध ऐसा
कि उसे माँ से मिलने नहीं दिया
वह तो केवल
अपनी ऊँगलियां
फिराती रही
समय की रेती पर ।

हथकड़ी बन गये थे
हमारी शादी के बन्धन
क्योंकि वह परले दर्जे की
स्वार्थी है
यह निमन्त्रण
कोई मुझे जलाने की तरकीब नहीं
उसकी चालाकी है
कि इस बहाने
हमारे… पर अब सिर्फ़ मेरे शिशु को
साथ लाऊँगा
और वह देख लेगी उसे
जी भर कर अपनी आँखों से
लगा पायेगी कलेजे से
पकड़ा दिया है मुझे यह
निमन्त्रण !

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/07/blog-post_03.html

Hobbits disappeared!

http://hariharjha.wordpress.com/2008/05/16/hobbits-disappeared/

सितम्बर 24, 2009

मण्डी बनाया विश्व को

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:14 पूर्वाह्न
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लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

क्रेन पर ऊँचा चढ़ा कर, चैन उसकी क्यों तोड़ दी
दर्शन बनाया लोभ का , मझधार नैया छोड़ दी
ऋण-यन्त्र से मन्दी बढ़ी, डॉलर नदी में बह लिया
अर्थ के मैले किनारे,   नाच से सम्मोहित किया

बहकता उन्माद सिर पर, क्यों हमें बहका न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

है सैज सिक्कों की बनी, सब बेवफ़ायें सो रही
मण्डी बनाया विश्व को, निलाम ’गुडवील’ हो रही
गर्मजोशी बिकी, जादू सौदागरी का चल गया
शेयरों से आग धधकी, ज्वाला में लहू जल गया

तड़पता सूरज दहक कर कहो क्यों झुलसा न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

’उपभोग’ की जय जय हुई, बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना ’सामान’ और , रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला विज्ञापन की, हर कोई यहाँ फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर, विषकन्या-रूप  डँस लिया

फैकी गुठली रस-निचुड़ी, कहो  क्यों ठुकरा न देगा
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post_7797.html

Hunger – 3 Faces

http://hariharjha.wordpress.com/2007/09/11/hunger-3-faces/

जुलाई 21, 2009

गुनगुनाती हो !

Filed under: अतुकांत,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:16 पूर्वाह्न
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क्यों पोत रही तुम
मेरी सूखी हड्डियों पर
इन्द्रधनुषी रंग
उतर कर मेरे आंगन में !
क्यों जम्हाई लेने के बदले
ले रही मनमोहक अंगड़ाई;
चीखो और चिल्लाओ !
रोको मत
बहने दो दुख भरे आँसूओं को
क्यों कि मैं तो विमूढ़ हूँ
देख कर तुम्हारे
प्रेम से छलछलाते नयन
तुम मन में उभरते अंधड़ को
मत छिपा दो अभिसार की याचना से;
इधर जब भी
मैं उलझता अपने डगमगाते दायरों में
तुम चहकती हो इसे मेरी सफलता समझ कर
भावों और शब्दों का तुम्हारा ऐसा जुगाड़
कि मुझमें माचो देख पाने की दलील
सुन कर
हो रहा मैं पसीने से तरबतर;
देख कर तुम्हारी आँखों में
प्यार की नमी का सैलाब
फँस जाता भंवर में
और तुम …
तुम्हारे कमल जैसे चेहरे पर
तैरते
अधखुली आँखों के तीर
मेरी कोशिकाओं से
टपकाते हैं
केवल खून !
पर तुम हो कि इस
मेरी दर्द में दबी
हिसहिसाहट को
ले कर अपने अधरों पर
गुनगुनाती हो !

-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post_19.html

Pleasure or Pain? :
http://boloji.com/poetry/4001-4500/4085.htm

जुलाई 6, 2009

जनता की किस्मत फूटी

Filed under: अतुकांत,व्यंग्य,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:46 पूर्वाह्न

झगड़ा हुआ नेताजी और पत्रकार में
मंहगाई की मार से बावले हुये पत्रकार ने
मला सिर पर बाम
लगाया नेताजी पर इलजाम
किसी कोमलांगी के बदन को छूकर
उसके घूंघट की ओंट से निकला एक विडियो टेप
दूसरे दिन व्यभिचार¸ दुराचार की
सुर्खियां छाई
बड़े बड़े अक्षरों में
हाय तौबा हुई
टांग खिंचाई की जनता ने
नाराज हो कर पत्रकारिता की गंदी चाल पर
नेता चिल्लाया और झल्लाया
गेर जिम्मेदार मिडिया पर
भनभनाया “उस दो कौड़ी के पत्रकार” पर
झगड़े मे फंसी युवती से
नाटक किया राखी का
शब्दों की बैसाखी का
उल्टा फंसाया कलमघीसू को
हथकड़ी पहनाकर
बाजार मे घुमाया
हुआ हंगामा सदन में
जब जनता रोती रही रोजी रोटी को
बिजली, पानी और सूखी खेती को
तो जिम्मेदार मिडिया और सूचना के नियन्त्रण पर
भाषण हुये एक्ट बनाने
असंतुष्टो को मनाने
सेमिनारों पर
रकम हुई स्वाहा
मुहं से निकला अहाहा !
मलाई गई नेताजी को
हिस्सा मिला पत्रकार को
मिलीभगत हुई, लड़ाई टूटी
पर दोनो की इस मारामारी में
जनता की किस्मत फूटी।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/05/blog-post_15.html

Ram and Ravan :

http://poetry.com/dotnet/P7382407/999/34/display.aspx

 

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