मिला सम्मान उसे नकारुं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?
हाय! क्षणभंगुर इन फूलों का जीवन
कुम्हलाकर सब व्यर्थ हो जायगा
दिखा दिखा कर अकड़ रहा हूं
क्षण गया यह तो अनर्थ हो जायगा
बिना तृप्त किये अहं मन मारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?
धन भाग हुये इस माला के
मुझ महामहिम का कण्ठ पाया
धनभाग हुये इस धागे के
जो मेरी देह को छू पाया
जीत ली सारी दुनियां उसे हारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?
पहनाओ मुझे हार बाद मे
दुनियां भर के लफड़े दे जाओ
भले ही मुर्ख बना कर पहना दो
बाद मे पहने कपड़े उतार जाओ
डूबा मन बिन माला के उबारुं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?
-हरिहर झा
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