हरिहर झा

July 19, 2007

शेर

Filed under: शेर — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:48 am

ये नशीली आंखे जो मिली मर कर कयामत के दिन
समझा  कयामत में भी   पाई सागरेशराब

हंसी लब खुले पर निकल न पाया कोई लफ्ज़
ये मुहब्बत का अंदाजेबयां या दिल मे कशमकश

हां पर उड़ते आकाश मे ना कहती तो मर जाते
सवालेवस्ल सुना  झट से  क्यों गर्दन झुकाली

इकरारेमुहब्बत का अन्दाजेबयां सुभानल्ला
जरूर दिल से गुफ्तगू में पस्त हुआ  जमाने का डर

नामोनिशां न होगा कल से रंग का रूप का
शामे जुदाई    इस डर से खड़ी है रंगीन लिबास में

लब सी लिये मैंने जमाने की शिकायत सुन कर
 गमख्वार मिला तो  चंद शेर सुनाने को तरस गया

जिन्दगी करती खुशामद कि यह लो वह लो
खूनेतमन्ना के बाद बाकी क्या बच गया

बिखर गई तेरी महफिल फिर दुबक लिये सपनो मे
दिल से कभी जाने न देंगे दिल का ये वादा है

कह दिया  जो कल तुमने हर लफ्ज मे बस  तुम हो
था एक अदना सा  सपना  वह  सपना केवल तुम हो

                              -हरिहर झा

February 16, 2007

चुप हूं

Filed under: अनुभूति, मंच, शेर, साउथ एशिया टाइम्स — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:06 pm

खुल कर रोया था जनमने के बाद
हालात अब ये है कि बरसों से चुप हूं।

अंदाज़े-बयां था कातिल का जुर्म किसका है
सामने उसके उसका नाम लेने से मैं चुप हूं।

भूखा पेट मेरा और डकार लेने को कहा
चूहा पेट का न दिख जाय इसलिए मै चुप हूं।

सोचा था हंस हंस कर पियेंगे ग़म के आंसू
सैलाब ग़म का आया इसलिए मैं चुप हूं।

दिल से दरिया-ए-इश्क बहा देने के बाद
कहा कि अब अश्क बहा इसलिए मैं चुप हूं।

घाव पर मलहम के बदले नमक छिड़का
ये भी क्या कम है खुदा कि मैं चुप हूं।

गुनाह बहाना बना नए गुनाह करने को
फंसा दलदल मे पर ये तमाशा कि मैं चुप हूं।

क्या बोलूं जब पूछा खुदा ने गुनाहों का सच
सच केवल इतना ही कि तू पूछे और मैं चुप हूं।

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/chup.htm

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