मेहनत मधुमक्खी करले हम घोघे और तिलचट्टे हैं
मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं
सुस्ती हरदम छाई रहती काम करे तो कौन
हाथ उठाना दूभर है तो हुये सभी हम मौन
दुनियां चांद पे जा पहुंची हम तो पलंग पे सोये
काहे करते माथापच्ची हम सपनो में खोये
भाग्य भरोसे बैठ रहे खेले जूये और सट्टे हैं
मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं
हो डाली पर बैर मीठा ले लेने में कष्ट
काहे खोजें परमाणु बम दुनियां होवे नष्ट
शयन भंग ना हो और खाना पीना अच्छा कितना
बिना काम लड्डू मिल जाय भाये मन मे कितना
हुआ काम हराम तभी तो पेट पे बांधे पट्टे हैं
मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं
मिलना होगा मिल जावेगा पचड़ा व्यर्थ लिया क्यों
अन्धे विश्वासों मे पल कर दर्शन खड़ा किया यों
मिथ्या यह संसार, जगत है सुन्दर सा इक सपना
नसीब मे जितना भी लिखा बस उतना ही अपना
दौड़धूप से नानी मरती भले ही हट्टे-कट्टे हैं
मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं
-हरिहर झा