हरिहर झा

July 1, 2008

कविते !

Filed under: अतुकांत, व्यंग्य, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:36 am

हिमालय !
तू बह जा
इमारत !
तू ढह जा
गंगे !
तू बह जा
ऐसे ही
पांच सात
अटपटे
चटपटे
रसीले
मधुभरे
वाक्य मिल कर
कविते !
तू बन जा

- हरिहर झा

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June 1, 2008

आश्वासन

मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे
( नरक के बदले )
शायद चित्रगुप्त की भूल
या खिलाया
कम्प्यूटर ने गुल

नकली दया दिखाई थी
वो गई असल के खाते में
रिश्वत खाई वो पैसा गया
दान के एकाउन्ट में

हाय ! कर्मों का लेखा आया
कुछ ऐसे स्वरुप में
घपला ये हुआ कि
मन्त्री की छवि उभरी
सन्त के रूप में

अंधे के हाथ बटेर !
देखा, स्वर्ग में खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का नर्तन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का वर्तन

गंधर्व, किन्नर सब आये और गये
नहीं लगे अपने से
साकी और जाम
सब लगे सपने से

इच्छा हुई अपना झन्डा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की
अमीर ! गरीब !
पर शब्द हुये विलिन
न कोई अमीर था न कोई गरीब
हिम्मत कर बोले मन्दिर… मस्जिद…
पर सब अर्थहीन

जिबान बन्द रही
बैठे रहे मन मार
मानो काया पर हो रहा
छुरे भालों का प्रहार

अब लाइसेन्स, रिश्वत, घोटाला
सब गया
मानो गरम गरम तेल की
कड़ाही में शरीर झुलस गया

दो यमदूत और चित्रगुप्त अचानक दिखे
मन्त्रीजी उन पर ही बरस पड़े
“ऐसा होता है क्या स्वर्ग ?
नरक से भी बदतर !”

( क्रमश: )

आश्वासन 2

( पिछ्ली कविता का शेष )

चित्रगुप्त ने जवाब दिया
हँसते हुये -
“कैसा स्वर्ग मत्रींजी ! याद कीजिये आपने
देश के गद्दारो के साथ
पकाई खिचड़ी
आपको तो कुम्भीपाक में पकाया जायगा
आपने जनता से किये थे झूठे वादे
दिये थे आश्वासन
बदले मे यह नरक - स्वर्ग से उल्टा
स्वर्ग का शिर्षासन है
और ये मेनका-उर्वशी की छवियां
स्वर्ग का आश्वासन है ।

- हरिहर झा

- हरिहर झा
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December 20, 2007

हार पहनाया मुझे !

Filed under: तुकान्त, व्यंग्य, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:05 pm
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मिला सम्मान उसे नकारुं कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार उतारुं कैसे?

हाय! क्षणभंगुर इन फूलों का जीवन
कुम्हलाकर सब व्यर्थ हो जायगा
दिखा दिखा कर अकड़ रहा हूं
क्षण गया यह तो अनर्थ हो जायगा

बिना तृप्त किये अहं मन मारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?

धन भाग हुये इस माला के
मुझ महामहिम का कण्ठ पाया
धनभाग हुये इस धागे के
जो मेरी देह को छू पाया

जीत ली सारी दुनियां उसे हारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?

पहनाओ मुझे हार बाद मे
दुनियां भर के लफड़े दे जाओ
भले ही मुर्ख बना कर पहना दो
बाद मे पहने कपड़े उतार जाओ

डूबा मन बिन माला के उबारुं  कैसे?
हार पहनाया मुझे,  हार  उतारुं कैसे?

                     -हरिहर झा

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December 5, 2007

मुखौटा

नादान बच्चे
पहन कर मुखौटा
डराते फिरते है
नहीं जानते वे
उनके डराने की प्रवृत्ति भी
एक तरह से भीतर का घमंड है
वे मेरी तरह विनम्र होना नहीं जानते
अब मुझे ही देखिये
मैं एक आदर्श पिता
आदर्श पति और पुत्र
मेरे भीतर कुछ बाहर कुछ
ऐसा कभी नहीं होता
क्योंकि मैं मुखौटों को
हाथ नहीं लगाता
मैं तो सुक्ष्म स्तर पर भी
मुखौटों के विरूद्ध हूं
इतना कि
विचार स्वतंत्रता की ऐसी ध्वजा फहराता
कि बिल्कुल पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर
बनता हूं कभी संघी
कभी कम्यूनिस्ट के साथ
भले ही फायदा देख कर ;
चल जाता इसलिये
अपना सिक्का खोटा नहीं
और मेरे विचार कोई मुखौटा नहीं
इस मुखौटे से बँधा मेरे पीछे कोई
धागा नहीं
और चमड़ी के भीतर मैंने
ट्रांसप्लांट करवाया एक मुखौटा
और उसके ऊपर दूसरा
बुरी तरह
चिपक गया हो पड़े-पड़े
ऐसा भी नहीं
क्यों कि उसे बदलना हो तो झंझट
बैठे बिठाये ;
नहीं, मुझे सख्त नफरत है
मुखौटों से
दूर बैठे नादान बच्चे
न जाने
क्यों खेलते हैं
मुखौटों से ।

- हरिहर झा

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November 8, 2007

हम कवि हैं या मसखरे

हम कवि हैं या मसखरे
सब को हँसाते
जनता का दिल लुभाते
कविता याने कि कैसी हो
बहती नदी जैसी हो
पहले कविता लिखी छन्द में
बोले संपादक जी - अमां यार
कुछ नया लिखो कि कविता संवरे
क्या ये कलि और भंवरे!
गये कालिदास के जमाने
ये हटाओ नागफनी, लगाओ कैक्टस
मैंने देखा - सिसक रही कविता
दहेज की सताई सुहागिन की तरह
मैं बहुत रोया
शब्दों को अंग्रेजी में धोया
हर पंक्ति मुझसे सवाल पूछती
और बवाल मचाती
अपने चेहरे पर घाव दिखाती
तो चढ़ा दिये उस पर मुखौटे
अब कौन नीर भरी
कौन दुख की बदली
ऐसी लाइन पर लाइन बदली
कि ले आये सीधे
रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रक का हार्न
वेयर आइ वाज़ बोर्न !
गलत सलत
सब कुछ चलत
खड़े हो गये मंच पर
अध्यक्ष बोले - करो बातुनी स्त्रियों पर व्यंग्य
मैं रह गया दंग
आवाज आई - बोलो कुछ
पत्नी की राजनीति पर, नहीं..हनीमून में आपबीती पर
नहीं… नहीं… हिजड़ों की संस्कृति पर
तंग आकर हमने
एक जोक सुना दी - नोन वेजिटेरियन
जिसके आर पार
फूहड़पन का व्यापार
हुई तालियों की गड़गड़ाहट
मुझे घोषित किया - श्रेष्ठ कवि.. एक महाकवि
मैं खुश, श्रोता खुश
स्वर्ण-पदक दिया गया
हँसाती चैनल ने सराहा
पर भीतर से मेरा दिल कराहा
शरम आई मुझे अपनी सफलता पर
तीर चुभ गया
काश ! ऐसी प्रशंसा व्यंग्य में की होती
तो कविता की मेरे हाथों
दुर्गति न होती ।

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August 16, 2007

अंगुर खट्टे हैं

Filed under: तुकान्त, व्यंग्य, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:15 am

मेहनत मधुमक्खी  करले हम घोघे और तिलचट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

  

सुस्ती हरदम छाई रहती काम करे तो कौन

हाथ उठाना दूभर है तो हुये सभी हम मौन

दुनियां चांद पे जा पहुंची हम तो पलंग पे सोये

काहे करते माथापच्ची  हम सपनो में खोये

   

भाग्य भरोसे बैठ रहे खेले जूये और सट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

  

हो डाली पर बैर मीठा  ले लेने में कष्ट

काहे खोजें परमाणु बम  दुनियां होवे नष्ट

शयन भंग ना हो र खाना पीना अच्छा कितना

बिना काम लड्डू मिल जाय भाये मन मे कितना

   

हुआ काम हराम तभी तो पेट पे बांधे पट्टे हैं

मिल जायें  तो मीठे ना मिल पाये  अंगुर खट्टे हैं

   

मिलना होगा मिल जावेगा पचड़ा व्यर्थ लिया क्यों

अन्धे विश्वासों मे पल कर दर्शन खड़ा किया यों

मिथ्या यह संसार, जगत है सुन्दर सा इक सपना

नसीब मे जितना भी लिखा बस उतना ही अपना

  

दौड़धूप से नानी मरती भले ही हट्टे-कट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

                    -हरिहर झा

June 27, 2007

चल तू अकेला

Filed under: तुकान्त, व्यंग्य, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:51 pm

मियांबीबी दो झगड़ते थे भारी
सोंचा सुलह करवा देगें हम सारी

फंस गये मियांबीबी दोनो को झेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला

घुसे थे भीड़ में लाटरी का चक्कर
पर हो गई जेबकतरे से टक्कर

बची अठन्नी ना रहा ना धेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला

  
चढ़ गये स्टेज पर माइक हमने लेली
सोंचा कविता देगी रुपयों की थेली

भर गया फेंकी हुई चप्पल का थेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला

चुनाव मे सिर दिया मेहनत से जुटे
विरोधि कमबख्त  ले चाकू  टूटे

लौट के बुद्धु घर आने की वेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला

इंटरनेट पर हिरो होने का दावा
चट आगया ऐर्श्वया का बुलावा

उसकी आयु सनसठ हुआ झमेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला

एकला चलो रे की आदत जो छुटी
लुटे और पिट गये किस्मत ही फूटी

अब तो बन जा तू टेगोर का चेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला

                          -हरिहर झा

June 14, 2007

हम बहुत ही बोर हुये

Filed under: मंच, व्यंग्य, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:45 am

बचपन की सहपाठिन मिल गई शुरू हुये ईमेल
बीवी ने जब बांच लिये तो खतम हो गया खेल

पूछपरछ मे धमधम गीरते बर्तन के खूब शोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

आफिसगर्ल  से पटते पटते जगी हमें कुछ आस
गड़प कर गया बॉस उसे तो हमे न डाली घास

कभी न दोनो मिल पाये फिर नदियों के दो छोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

सेलगर्ल ने बक्सा  खोला दिखलाये सब अंग 
अर्धागिंनी ने आधे में ही किया रंग मे भंग

तांक-झांक सब ऐसी पकड़ी नजरों के हम चोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

साकी बाला मुफ्त पिला कर कर गई मटियामेट
घर बिज़नेस न छोड़ा हमने उगल दिये सिकरेट

बुद्धि नशे मे भ्रष्ट हो गई मूर्खो के सिरमौर हुये
हम बहुत ही बोर हुये

- हरिहर झा

Love is an illusion :

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April 19, 2007

नंगा बोल पड़ा

Filed under: तुकान्त, मंच, व्यंग्य, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:12 am

                       
कंगला डूबा चिन्ता मे तू मुझे लूट कर क्यों ले जाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

रिश्वत भ्रष्टाचार से पनपे नेताजी की बात
पकड़े गये पद मन्त्री का अब कैसे मारें लात
भाषणबाजी लगे झाड़ने दिन देखा ना रात
अन्तरात्मा को घसीट  की विरोधियों पर घात

आत्मा की आवाज कहां की हाय गरीब की सुन ना पाय
 नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

बुद्धूराम समझ बैठे खुद बुद्धि के अवतार
दो और दो को तीन बतायें समझें खुद होंशियार
अक्ल बड़ी या भैंस कहें तो भैंस बड़ी है यार
समझाया तो गुस्से मे आकर कर देंगे वार

खाली भेजे मे भी चिन्ता उनका भेजा कोई न खाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

धरम के ठेकेदार चले हैं ध्वजा धरम की थाम
छुरी छुपाई बगल में मुख से लिया राम का नाम
दौड़े सुख की चाह मे वृत्ति रही काम या दाम
मन मे हरि को खोज न पाये ढूंढे चारो धाम

नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने को जाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय़।

                           - हरिहर झा

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