संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
आँच नियन्त्रण से बाहर हो कर ना दे मुंह काला
मूरत देखी खजुराहो में आसक्ति की माया
कत्थक हो या भरतनाट्यम वही भाव तो छाया
अनुभूति हो अभिव्यक्त तो जीवन मीठी बानी
दमन किये दिल रहा भटकता प्यासा मांगे पानी
तपती आंच में रहा उबलता फफक उठा तब छाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
प्रीत बिना बेचैन रहा दिल दौड़ा था दिन रात
ऋषि मुनि के संयम को यह पशु दे गया मात
मिलने को लैला से मजनू मारा मारा फिरता
सोये लेकर नशा वासना अंधकूप में गीरता
सपने में बन सांप डराये किस कुतिया को पाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
कुरेद कर भीतर से कोई व्यर्थ अड़ाये टांग
होती नादानो सी हरकत़ खाली जैसे भांग
प्रेम का स्वांग रचा कर लेता कामदेव प्रतिशोध
जोश खो गया होंश ना रहा कहां ज्ञान का बोध
दबी भावना पर शोभित था शर्म हया का ताला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
- हरिहर झा
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Hobbits disappeared! Why and How? :
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रो पड़ा सुन कर कहानी गहन यह संवेदना
दिल नहीं पत्थर हो वे ना समझ सकते वेदना
भेद खुलवाने को शठ का निहत्थे पर वार हो
यन्त्रणा देता कसाई भोंक रहा कटार हो
पिघलता लोहा जब दिल में मशीनी हथियार हो
बरसता बन दर्द बिजली आग की बौछार हो
दिल को ठंडक दे सकूँ कुछ भी करते ना बना
चोंट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना
रेंगते कीड़ों का आतंक बस गये हैं घाव में
मनोरंजन कर रहे मवाद पीते चाव में
खून ज्यों लावा पिघलता अस्थि मज्जा जल रहे
वायरस उन्माद के धर्मान्धता के पल रहे
लहू के आंसू छलकते जीभ खुलना है मना
चोंट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना
हे विधाता यन्त्रणा क्यों ? बस यही मलाल है
दिया क्यों शरीर? सारे दर्द की जंजाल है
मनोवृत्ति परपीड़क शैतान की ही चाल है
मौत से बदतर हुआ इस ज़िन्दगी का हाल है
बस करो पिशाच मानवता के उर को छेदना
चोट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना
-हरिहर झा
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चंचल आंखों की पीड़ा से छलक रहा क्यों जाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
कैसे बच पायेगा पंखी ठगी हुई सी आंखें
छाया विष हलाहल नभ में उड़ती दोनो पांखें
गले तीर के लग जाने के कैसे ये अरमान
चीर कलेजा क्षुधा मिटाने की मन में ली ठान
नरक बनी दुनिया सपने में आती स्वर्ग समान
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
मानमनावन कैसे हो दिल में हसरत की आग
अधर मौन होकर सोचे अब जागे मेरे भाग
दिल डूबा गहराई में भावों के स्वप्निल पंख
ओले बन अंगारे बरसे कलियां मारे डंख
शीतल छांव के दो पल, बदले में वियोग हाय राम !
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
खड़ा हुआ खलनायक देखो, बन कर भाग्य विधाता
हाय ! विदूषक मसखरी करता, सब्ज बाग दिखलाता
ठौर ना मिला प्रेम को, छलनी हुआ गया अब चैन
कैद हो गया अपराधी सा, अश्रुपूरित नैन
अमृत की दो बूंद जहर से मिल कर काम तमाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
Why Torture?
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रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार
बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार
भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार
भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार
भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार
माँ की लीला कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार
प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार
छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार
क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम -
पुष्प के रस का तार
बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।
-हरिहर झा
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खुशियों की बौछार खिलखिलाता मौसम आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया
देवालय पर पूर्ण चन्द्रमा अनहोनी यह बात
दीप जल रहे लगता निकली तारों की बारात
फुलझडि़यों की माला निहारिकाओं का आभास
फूट रहे पटाखे बम चलते कदमों के पास
युवकों की शरारत मस्ती का आलम छाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया
चरणों में लक्ष्मी मैया के झुक झुक जाता माथ
मिठाइयां सूखे मेवे ले लेते भर भर हाथ
भागे दुख जंजाल छा गई दीप पर्व की माया
गोल घूम रहे ग्रह नक्षत्र स्वर्ग यहां लो आया
इन्द्रलोक की उर्वशी का नृत्य उतर आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया
खेल रहे खिलौनों से बन वायुयान के चालक
नई नई पौशाक अकड़ते खेल रहे हैं बालक
इन्तजार था महिनों से कि कब आये दिवाली
लटक मटकते झूम बजाते दो हाथों से ताली
तोतली बोली शिशुओं की कितना आनन्द समाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया।
- हरिहर झा
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Smiled the Sun :
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मोम की कसक जो दर्द बन गई
पिघलपिघल लौ से दूर हो गया
आंसुओं की गर्मी से कराह कर
खण्ड मे बंटा तो चूर हो गया
रागरागिनी के लय विलय हुये
छटपटाता भाव मौन हो गया
ग्रीष्म चूसता रहा समुद्र को
अंधकार चांद ही को डस गया
लड़झगड़ नदी सुमेरू श्रृंग के
केश घने खींच कर पकड़ रही
वायु भय से कांप कर लिपट रही
पर्वतों की चोंटियां जकड़ रही
सुन विलाप जलप्रपात जब हंसा
क्यों हंसा जो गिर रहा पाताल मे
अन्तर्मुखी हो सुन रहा गाती हुई
माधुरी के स्वर अनोखी ताल में
किरन भी यह देख कर के हंस उठी
हंस उठी आकाश की गहराईयां
दूर हुई छिटक करके बह गई
खो गई लो गमो की परछाईयां
कलि मुस्कुराई देख कर सभी
चेहरे खुशी से खिल रहे भले
चांदनी नजर मिलाती चांद से
फूल तितलियों से मिल रहे गले
अभिसार अर्चना का रूप ले
मेघ की उड़ान नृत्य बन गई
दामिनी का नृत्य प्यार हो उठा
प्यार की उमंग फिर बहक गई।
-हरिहर झा
For “Blackens your Face” read
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कैसे मन की अगन बुझे
राख मे शोल़े़, जलन तुझे
झुलसी लपटें क्यों सह कर
मौन मुखर!
दिल बोले हर अंग जले
वाणी सरगम की निकले
सांसे चुपचुप क्यों डर कर
मौन मुखर!
नभमण्डल के तारे मौन
जग की वाचा सुनता कौन
मानव आहें भरभर कर
मौन मुखर!
भाव भरी कविता गढ़ कर
सुरलय की सीढ़ी चढ़ कर
दिव्य साधना मे गल कर
मौन मुखर!
मौन शुन्य से निकली सृष्टि
ब्रह्मज्ञान की अनुपम द्रष्टि
मोक्षद्वार पर पहुंचेगा नर
मौन मुखर!
जीवन से कुछ राहें निकली
पर जिस दिन अर्थी निकली
प्राणो के स्वर हुये मुखर
मौन मुखर!
-हरिहर झा
(संगीत-रूप में उपलब्ध)
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm
मधुर मिलन की दो घडियों में
प्रिये ! न इतना शरमाओ
उषा की लाली लज्जित हो
घनमाला में छिप जाए
छलक उठी नैनों की मदिरा
बह जाने के लिये नहीं है
मुस्कानों में फूल महकते
मुर्झाने के लिये नहीं हैं
युवा उमंगों की यह सरिता
थम जाने के लिये नहीं है
खिली कली या मादक यौवन
संकुचाने के लिये नहीं है
इतराओ रूठो मुस्काओ पर
इतना मत शरमाओ
उषा की लाली लज्जित हो
घनमाला में छिप जाए
इंद्रधनुषी मुद्राएं
घूंघट में खेलीं किसने जानीं
प्रीत की लहरें मन ही मन
उठीं भला किसने पहचानीं
अल्हड़ यौवनकी अल्हड़ता
मादकता किससे अनजानी
नहीं गुदगुदाता कोकिल स्वर
बोलो बगिया की रानी
मदमाती मत पलकें मूंदो
यों इतनी मत शरमाओ
उषा की लाली लज्जित हो
घनमाला में छिप जाए
-हरिहर झा
*(संगीत-रूप में उपलब्ध)
http://www.anubhuti-hindi.org/1purane_ank/2003/05_24_03.html