मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे
( नरक के बदले )
शायद चित्रगुप्त की भूल
या खिलाया
कम्प्यूटर ने गुल
नकली दया दिखाई थी
वो गई असल के खाते में
रिश्वत खाई वो पैसा गया
दान के एकाउन्ट में
हाय ! कर्मों का लेखा आया
कुछ ऐसे स्वरुप में
घपला ये हुआ कि
मन्त्री की छवि उभरी
सन्त के रूप में
अंधे के हाथ बटेर !
देखा, स्वर्ग में खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का नर्तन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का वर्तन
गंधर्व, किन्नर सब आये और गये
नहीं लगे अपने से
साकी और जाम
सब लगे सपने से
इच्छा हुई अपना झन्डा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की
अमीर ! गरीब !
पर शब्द हुये विलिन
न कोई अमीर था न कोई गरीब
हिम्मत कर बोले मन्दिर… मस्जिद…
पर सब अर्थहीन
जिबान बन्द रही
बैठे रहे मन मार
मानो काया पर हो रहा
छुरे भालों का प्रहार
अब लाइसेन्स, रिश्वत, घोटाला
सब गया
मानो गरम गरम तेल की
कड़ाही में शरीर झुलस गया
दो यमदूत और चित्रगुप्त अचानक दिखे
मन्त्रीजी उन पर ही बरस पड़े
“ऐसा होता है क्या स्वर्ग ?
नरक से भी बदतर !”
( क्रमश: )
सोंचा था ईश्वर ने
दुनियां हो रंगीन
ना रहे कोई एकाकी
जानवर तो जानवर
फिर नर क्यों अकेला?
जैसे हाथी और घोड़ा
कबुतर और चिडि़या, बंदर और गुरिल्ला
आदमी के साथ करो कुछ फिट
पर लुप्त हो गये - गुम हुये होबिट ।
क्या अच्छा न होता कि
होमो-सेपियन के अलावा
एक दूसरी तरह का नाइंसान इंसान
जो इन्सान जितना जानवर न हो
पर इन्सानियत में कम न हो !
डर गया विधाता
एक बुद्धू - याने बुद्धिशाली आदमी
बना बैठा हिन्दू-मुसल्मां
बामन-शूद्र - अलगअलग नस्ल….
आगया जो दूसरी तरह का इंसान
फिर कैसे रोक पायेगा खुले आम
हत्या, मारपीट
बजेगी ईट से ईट
तो क्या होगा?
मानव पियेगा लहू
और होबिट खायेगा मीट
गुम हुये होबिट ।
होबिट ने सीखा खानापकाना
गुमसुम होकर
मानव के सामने सिर झुकाना
होबिट-मानव भाई-भाई
पड़ न जाय भारी कीमत चुकाना
बड़ी चालु चीज़ है आदमी - करेगा चीट
गुम हुये होबिट ।
मुख में बुद्ध
भीतर से क्रुद्ध
इंसान-इंसान में
होता विश्वयुद्ध
लाखों लोगों को
एटम की गर्मी में
भूनेगा
पकायेगा
खा पायेगा इतना !
सोंच कर यही मर जायगा होबिट
गुम हुये होबिट ।
वे संतुष्ट थे झोपड़ी में
जंगल में
समृद्धि के तनाव से मुक्त;
ये तो इन्सान चिढ़ गया
ऐसे भोलेपन पर
उदारता का ढोंग रच कर
जाने क्या लाद दिया
होबिट पर
कहती किंवदंतियां
वे थे “नरक के वासी”
न होबिटस्तान मांगा
न और कुछ
तीन या चार फिट के ये वामन -
नन्हे ठिगने बौने लोग
धरती छोड़ गये - विशाल
एक नन्हे ठिगने बौने दिल वाली
लालची नस्ल के लिये
बस गुम हुये होबिट।
- हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/03/blog-post_21.html
For “Cheers Or Jeers”
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=41
OR
http://hariharjha.wordpress.com/2007/04/02/cheers-or-jeers/
मस्ती के आलम में
कहां से चली आई
एक परीक्षा
जिसके लिये
मै बिल्कुल तैयार नहीं
क्या बताऊं !
मेरा तो बज गया बाजा
मै ऊंघ रहा हूं
स्वप्न में भी
यह परीक्षा है या स्वप्न ?
पर यह भाव कि
खेला किया और गवांया जीवन
पढ़ा नहीं और अब
असफल कोशीश !
क्या करुं ?
थर थर कांपे तन मन
कितना असहाय !
बेखबर दुनियां से
अनाथ अनजान सा
डरा सहमा सा
मर गया मैं या मेरी नानी
पर श्राद्धपींड नजर आ गये।
काली डरावनी
गुफा मे खो गया टाइमटेबल
घंटी बजेगी घनघन …
प्रश्न कब होंगे सामने
कुछ पता नहीं
शायद आज ही !
अचानक कापी बनी आसमान
मेरा हाथ कलम
सूख गई सतकर्मों की स्याही
सामने यमराज सा परीक्षक
या फिर परीक्षक सा यमराज !
पता ही न चला
कैसी परीक्षा ? कैसी निन्द्रा ?
बाप रे बाप !
बचाओ मुझे बचाओ !!
मैं देख रहा हूँ
अपना ही मृत शरीर
यह मेरी नींद है या चिरनिंद्रा ?
घेरे हुये स्वजन
रोती बिलखती
और चीखती चिल्लाती पत्नी
फिर भी मेरी…
आंख क्यों नहीं खुल रही !
- हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/02/blog-post_9736.html
For “Pleasure or Pain?” (sonnet)
http://boloji.com/poetry/4001-4500/4085.htm
OR
http://hariharjha.wordpress.com/
पड़ोस की वह अन्धी लड़की
पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?
टीस उठती है मेरे दिल में
इतना भी नहीं जान पाती वह
और जान कर करेगी भी क्या ?
देखने से तो रही बिना आंख के
वैसे वह जन्म से अन्धी नहीं
सहपाठिन थी मेरी
केमेस्टी की प्रयोगशाला में
हुई एक दुर्घटना
ऐसी अफवाह है
कि थी किसी की शरारत
पर जब वह पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?
फटती हैं मेरे दिल की नसें
चीर जाती हैं सीने की पसलियां
निकलती पीड़ा की बूंदें
समा जाती रक्त में
मैं पागल हो उठता हूँ ।
कभी कभी सोंचता हूँ
क्यों न उसके इलाज का खर्च भी
मैं उठा लूं
पर इतना भी संवेदना में
बह जाना
ठीक नहीं
क्यों कि इसमें मैंने… मैंने…
क्या किया था
इसका प्रमाण भी क्या है
कौन जानता है इसे?
हां, जो मैं भुगत रहा हूँ
इसका नाम है कुछ
गर्मी दिमाग में
कि लपलपाती वेदना की भाप
फेफड़ों से बाहर निकलने पर
श्वांस नली
चिल्लाती है
ऐसी टीस उठती है ।
- हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2007/12/blog-post_27.html#hariharj
For Mask :
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=54
OR
http://hariharjha.wordpress.com/
( अति मह्त्वाकांक्षी लोग… क्या क्या गुल खिलाती हैं उनकी हीन ग्रन्थियां…)
पिकनिक पॉइन्ट पर खड़ा
मैं देख रहा
ढलकता पानी जलधारा का
मैं छूना चाहता झिझकती उंगलियों से
टपकती करूणा इन बूंदों से
गिरती खाइयों में
जिसकी गहराइयां भयदायी
पर कुछ बूंदो की लपटें
महत्वाकांक्षा लिये
वाष्पिभूत होकर
उठी आकाश की ओर।
मैं ही हूं वाष्पिभूत जल
ऊपर को उठता हुआ
क्यों समझते तुम मुझे
क्षुद्र और नीचा !
देखता हूँ
न जाने क्यों
नीचे रह गये
कीड़े-मकोड़े आनंदित हैं
मैं जल रहा नन्हेपन की पीड़ा में
घनीभूत हो रहा
ओछेपन का भाव
और सूइयां चुभती
हीन ग्रन्थि की
मैं चिल्लाता हूं
देखो , मुझे देखो
मेरी ऊँचाई !
पर मग्न हो तुम स्वयं में
विनाशकारी धारा से अनजान
बिजली के तार पर
बैठी चिड़िया की तरह;
मैं भी चहचहाना चाहता
कुछ परागकण
फैलाता वायुमण्डल में
बिखरा देता कुछ बीज धरती पर
मकसद वही
विशाल वृक्ष से प्रतिस्पर्धा करने ।
मेरे कम्प्यूटर का की बोर्ड
उपहास करता
मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु
निकली कीबोर्ड के बल्ब की चमक
आत्मसात होने
दूर गगन की
निहारिका की ओर
रह गई आधी अधूरी
धुयें की लकीर का छोर
इस ओर |
-हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/01/blog-post_5996.html
New theme on English blog to improve readability :
http://hariharjha.wordpress.com
न मिली थी माँ की थपकियां
और अब खो दी
प्रेमिका की स्मित मुस्कान
तो चल पड़ा वह
आकांक्षा लिये विश्वविजय की
पत्थर सी जड़ आंखों में
एक सपना दबाये
जिसमें मंद झकोंरों से गुजरी किरण किरण
चंचल नयनो में प्रतिबिम्बित होती
उस मतवाली का
चेहरा उठाये
अधरों की ओंट से अधर जोड़ने की प्यास
चुहुल करते ली थी उसने अंगड़ाई
रंगीन छेड़छाड़ और बिखरते मोती
प्रेम का स्पन्दन
पर ह्दय को मसोस कर
दबा गया कोमल भाव
अकेलेपन का सताया
जब रिश्तों ने
झूठा नाटक रचाया
तो अलग थलग होकर
बिछाये थे जो अरमान
कुचल डाले उसने
अब तो चमक रही युगल मीनारें गगनचुंबी
जो फैला रही खून से सनी हुई बाहें
डूबा वह शतरंज की क्रीड़ा में
मोहरा बना
जुनून से भरा उसका माथा पकड़ा उंगलियों ने
फूट पड़ा एक दर्दनाक प्रतिशोध
जब बारूद बनी दमित कुंठा
विषमय बनी यौन पिपासा
ज्वाला चिंघाड़ी अन्तर्मन की गहराइयों से
अमंगल ही तो हुआ
पर हुआ जो धमाका
गाज गिरी जो मिट्टी को मथकर
राक्षस का उद्गम
जो सोंचता -
यह आतंकवादी दुनियां
क्यों मुझे ही कहती
आतंकवादी
मैं इसकी
सजा दूंगा
धमाकों से बरबाद होंगे
वे घरबार
सब के सब
दीवार बन कर
खड़े हैं मेरे और उसके बीच
ये सड़क और गलियां
जो उसके पास
नहीं ले जाती
कर दूंगा इन्हे तबाह
और जो मरेगें
उसके स्वजन
उसके चाचा, मामा, ताउ
मामुली किसान और मजदूर का भेष धरे
मैं खत्म कर दूंगा यह धोखा
बन्दूक और बम गोले हैं
मेरा पुरूषत्व
अहा ! मुझे मिलेगी मेरी मंजील
कैसा विपल्व ? कैसी विनाशलीला?
सब कुछ होगा कितना रोमान्टिक !
यह विस्फोट या संभोग?
मैं कोई विक्षिप्त नहीं ….
-हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2007/12/blog-post_16.html
For A half poet
http://hariharjha.wordpress.com/2007/10/19/a-half-poet/
OR
http://hariharjha.wordpress.com
नादान बच्चे
पहन कर मुखौटा
डराते फिरते है
नहीं जानते वे
उनके डराने की प्रवृत्ति भी
एक तरह से भीतर का घमंड है
वे मेरी तरह विनम्र होना नहीं जानते
अब मुझे ही देखिये
मैं एक आदर्श पिता
आदर्श पति और पुत्र
मेरे भीतर कुछ बाहर कुछ
ऐसा कभी नहीं होता
क्योंकि मैं मुखौटों को
हाथ नहीं लगाता
मैं तो सुक्ष्म स्तर पर भी
मुखौटों के विरूद्ध हूं
इतना कि
विचार स्वतंत्रता की ऐसी ध्वजा फहराता
कि बिल्कुल पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर
बनता हूं कभी संघी
कभी कम्यूनिस्ट के साथ
भले ही फायदा देख कर ;
चल जाता इसलिये
अपना सिक्का खोटा नहीं
और मेरे विचार कोई मुखौटा नहीं
इस मुखौटे से बँधा मेरे पीछे कोई
धागा नहीं
और चमड़ी के भीतर मैंने
ट्रांसप्लांट करवाया एक मुखौटा
और उसके ऊपर दूसरा
बुरी तरह
चिपक गया हो पड़े-पड़े
ऐसा भी नहीं
क्यों कि उसे बदलना हो तो झंझट
बैठे बिठाये ;
नहीं, मुझे सख्त नफरत है
मुखौटों से
दूर बैठे नादान बच्चे
न जाने
क्यों खेलते हैं
मुखौटों से ।
- हरिहर झा
http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/11/blog-post_6500.html#hariharj
For Ram and Ravan click on:
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/15/ram-and-ravan/
OR
http://hariharjha.wordpress.com
दुनिया वालों, सुनो सुनो
खूब मजे लो वसन्त ऋतु के
पर कुछ हमारी भी सुनो।
भारत क्या और चीन क्या
यूरोप और अमरिका क्या
“या निशा सर्वभूतानां”
जब सारी दुनिया
पसीने से तरबतर
तब हम ऑस्ट्रेलियावासी
लिहाफ ओढ़ते हैं
हीटर चलाते हैं
जब दुनिया ठन्ड से थर थर कांपती
तब हमें दिखते हैं ‘सी-बीच’ पर
अर्धनग्न नजारे
दिल कहे न…जा …ऱे …।
सिलिकन वेली के खिलते सुमन
और भारत के
अनजान कस्बे की कोयल
कंप्यूटर के वेबकेम पर
सुर में सुर मिलाती हैं
“वसन्त आया”
तब मेरी खिड़की से बाहर
सूखे पत्ते आवारा पशुओं की भांति
एक दूसरे पर गिरते हुये
भटकते हैं
तब जी चाहता है
सिर अपना सड़क पर
ठोक ठोक कर उल्टा चलुं
पैरों से सोच सोच कर
दिवाली में खेलुं फाग
और होली में पटाखें छोडूं
क्योंकि हम तो
ऑस्ट्रेलियावासी
धरती के निचले गोलार्ध में
मकड़ी की भांती
पैर जमीन से चिपका कर
उल्टे चलते हैं।
-हरिहर झा
http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_02/02_04pravishtiyan4.htm#hj
For The boredom read :
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-boredom/
OR
http://hariharjha.wordpress.com