लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा
क्रेन पर
ऊँचा चढ़ा कर,
चैन उसकी तोड़ दी
लोभ का दर्शन बना,
मझधार नैया छोड़ दी
ऋण-यन्त्र से
मन्दी बढ़ी,
पोखर में
डॉलर बह लिया
अर्थ की सरिता में
भोंडे नाच से मोहित किया
बहकता
उन्माद सिर पर
क्यों हमें बहका न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा
सैज
सिक्कों की बनी,
सब बेवफ़ायें सो रही
मण्डी बनाया विश्व को,
निलाम ’गुडविल’ हो रही
गर्मजोशी बिकी,
सौदाई का जादू चल गया
शेयरों में
आग धधकी ,
लहू कितना जल गया
तड़पता सूरज
दहक कर
कहो क्यों झुलसा न देगा ।
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा
’उपभोग’ की
जय जय हुई,
बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना
’सामान’ तो,
रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला
विज्ञापनों की,
हर कोई इसमें फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर,
विषकन्या बन कर डँस लिया
फैकी गुठली
रस-निचुड़ी,
कोई क्यों ठुकरा न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा ।
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post_7797.html
Hunger – 3 Faces
http://hariharjha.wordpress.com/2007/09/11/hunger-3-faces/
घुटन है दिल में बहुत, नाराज दोनो रब जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?
पी गया आंसू, जो अग्नि ना बुझी तो विष पिये
प्यासी निगाहें दौड़ती, क्या ढूँढ़ लाने के लिये
ढीठ सी दिखती, कभी तो मुंह मुझसे मोड़ती
चिलचिलाती धूप में भी, क्यों न पीछा छोड़ती ?
धधकती इस आंच में, तड़पा गई मुझको यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?
सुनसान राहों में नजर डाली तुझे ढूँढ़ा किये
मिलन हो इस लालसा में, दाग दामन पर लिये
क्यों सताया रूप ने, निर्मम हुई मन की व्यथा
शापित हुई, लज्जित हुई है प्यार की पूरी कथा
हँस के शरमाई, मैं समझा प्रेम की देवी यहां
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?
जीत सूने मौन की, संगीत पर ऐसे हुई
दुराशा तेरी न जाने, फलित क्यों कैसे हुई
दुख से बोझिल मन हुआ है, देह जर्जर प्रेम बिन
बोल तेरे याद आये, ख्याल आये रात दिन
नागिन कहूँ, छलना कहूँ, तू लूट लेती है जहाँ
प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ?
-हरिहर झा
Her Teasing Face :
http://www.poetry.com/dotnet/P8989404/999/4/display.aspx
http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/
मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे
( नरक के बदले )
शायद चित्रगुप्त की भूल
या खिलाया
कम्प्यूटर ने गुल
नकली दया दिखाई थी
वो गई असल के खाते में
रिश्वत खाई वो पैसा गया
दान के एकाउन्ट में
हाय ! कर्मों का लेखा आया
कुछ ऐसे स्वरुप में
घपला ये हुआ कि
मन्त्री की छवि उभरी
सन्त के रूप में
अंधे के हाथ बटेर !
देखा, स्वर्ग में खुले आम
सोमरस बांटती सुन्दरी का नर्तन
वे कह न पाये इसे
पाश्चात्य संस्कृति का वर्तन
गंधर्व, किन्नर सब आये और गये
नहीं लगे अपने से
साकी और जाम
सब लगे सपने से
इच्छा हुई अपना झन्डा गाड़ने की
हूक हुई अब उन्हे भाषण झाड़ने की
अमीर ! गरीब !
पर शब्द हुये विलिन
न कोई अमीर था न कोई गरीब
हिम्मत कर बोले मन्दिर… मस्जिद…
पर सब अर्थहीन
जिबान बन्द रही
बैठे रहे मन मार
मानो काया पर हो रहा
छुरे भालों का प्रहार
अब लाइसेन्स, रिश्वत, घोटाला
सब गया
मानो गरम गरम तेल की
कड़ाही में शरीर झुलस गया
दो यमदूत और चित्रगुप्त अचानक दिखे
मन्त्रीजी उन पर ही बरस पड़े
“ऐसा होता है क्या स्वर्ग ?
नरक से भी बदतर !”
( क्रमश: )
( अति मह्त्वाकांक्षी लोग… क्या क्या गुल खिलाती हैं उनकी हीन ग्रन्थियां…)
पिकनिक पॉइन्ट पर खड़ा
मैं देख रहा
ढलकता पानी जलधारा का
मैं छूना चाहता झिझकती उंगलियों से
टपकती करूणा इन बूंदों से
गिरती खाइयों में
जिसकी गहराइयां भयदायी
पर कुछ बूंदो की लपटें
महत्वाकांक्षा लिये
वाष्पिभूत होकर
उठी आकाश की ओर।
मैं ही हूं वाष्पिभूत जल
ऊपर को उठता हुआ
क्यों समझते तुम मुझे
क्षुद्र और नीचा !
देखता हूँ
न जाने क्यों
नीचे रह गये
कीड़े-मकोड़े आनंदित हैं
मैं जल रहा नन्हेपन की पीड़ा में
घनीभूत हो रहा
ओछेपन का भाव
और सूइयां चुभती
हीन ग्रन्थि की
मैं चिल्लाता हूं
देखो , मुझे देखो
मेरी ऊँचाई !
पर मग्न हो तुम स्वयं में
विनाशकारी धारा से अनजान
बिजली के तार पर
बैठी चिड़िया की तरह;
मैं भी चहचहाना चाहता
कुछ परागकण
फैलाता वायुमण्डल में
बिखरा देता कुछ बीज धरती पर
मकसद वही
विशाल वृक्ष से प्रतिस्पर्धा करने ।
मेरे कम्प्यूटर का की बोर्ड
उपहास करता
मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु
निकली कीबोर्ड के बल्ब की चमक
आत्मसात होने
दूर गगन की
निहारिका की ओर
रह गई आधी अधूरी
धुयें की लकीर का छोर
इस ओर |
-हरिहर झा
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हम कवि हैं या मसखरे
सब को हँसाते
जनता का दिल लुभाते
कविता याने कि कैसी हो
बहती नदी जैसी हो
पहले कविता लिखी छन्द में
बोले संपादक जी – अमां यार
कुछ नया लिखो कि कविता संवरे
क्या ये कलि और भंवरे!
गये कालिदास के जमाने
ये हटाओ नागफनी, लगाओ कैक्टस
मैंने देखा – सिसक रही कविता
दहेज की सताई सुहागिन की तरह
मैं बहुत रोया
शब्दों को अंग्रेजी में धोया
हर पंक्ति मुझसे सवाल पूछती
और बवाल मचाती
अपने चेहरे पर घाव दिखाती
तो चढ़ा दिये उस पर मुखौटे
अब कौन नीर भरी
कौन दुख की बदली
ऐसी लाइन पर लाइन बदली
कि ले आये सीधे
रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रक का हार्न
वेयर आइ वाज़ बोर्न !
गलत सलत
सब कुछ चलत
खड़े हो गये मंच पर
अध्यक्ष बोले – करो बातुनी स्त्रियों पर व्यंग्य
मैं रह गया दंग
आवाज आई – बोलो कुछ
पत्नी की राजनीति पर, नहीं..हनीमून में आपबीती पर
नहीं… नहीं… हिजड़ों की संस्कृति पर
तंग आकर हमने
एक जोक सुना दी – नोन वेजिटेरियन
जिसके आर पार
फूहड़पन का व्यापार
हुई तालियों की गड़गड़ाहट
मुझे घोषित किया – श्रेष्ठ कवि.. एक महाकवि
मैं खुश, श्रोता खुश
स्वर्ण-पदक दिया गया
हँसाती चैनल ने सराहा
पर भीतर से मेरा दिल कराहा
शरम आई मुझे अपनी सफलता पर
तीर चुभ गया
काश ! ऐसी प्रशंसा व्यंग्य में की होती
तो कविता की मेरे हाथों
दुर्गति न होती ।
http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/10/57-25-09.html
For Paradox:
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-paradox/
OR
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विषम स्थिति हो लोग पराये फिर भी सब मे ईश्वर जानो
भांति भांति के फूल जगत मे खिलने दो खुशबू पहचानो
अन्तरिक्ष में ज्वाला भड़की चांद सितारे अस्त हुए
महाकाल ने डेरा डाला देवलोक भी ध्वस्त हुए
शीत लहर में आहें सिसकी कैसा यह हिमपात हुआ
चरम अवस्थाओं के झूले घात गई प्रतिघात हुआ
कहा धरा ने संयम बरतो देखो जीवन को पहचानो
बगिया बोली कली प्यार की खिलने दो खुशबू पहचानो
धर्म मार्ग पर यथा बाल शिशु किलकारी भरते जाते
भक्तिभाव का रस पी पी कर आनंदित होकर गाते
छन्द ताल मे बहे नदी उन्मुक्त बहे गति से झरना
शब्द ब्रह्ममय जगत यहां बिन दाग चदरिया को धरना
पोंगा पंडित इतराया तुम वेदशास्त्र को क्या जानो
कहा जगत ने अरे इन्हे भी खिलने दो खुशबू पहचानो
जंजीरों मे घिरी नारियां हुई स्वतन्त्रता बेमानी थी
देवी कह कर फुसलाया शोषण की नीति ठानी थी
सूत्रपात हो क्रान्ति का ‘आधीदुनियां’ को होश हुआ
प्रगति पथ पर अधिकारों की समता का उद्घोष हुआ
भोग्या नहीं, नहीं अबला है स्त्रीशक्ति को पहचानो
प्रेमस्रोत के फूल महकते खिलने दो खुशबू पहचानो
-हरिहर झा
http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_03/03_04pravishtiyan3.htm#hj
For “Hunger – 3 Faces: ( Which one is 3rd Face?)
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मौत से आंखमिचोली
कारगील हो या गेलीपोली
जंग की शतरंज का वादा
कोई वजीर ना प्यादा
सीने मे लगती जब गोली
कारगील हो या गेलीपोली
लड़ कर जो शहीद हो जाता
इतिहास नया लिखवाता
खेल कर खून की होली
कारगील हो या गेलीपोली
दे अपने जीवन को झांसा
रोती पत्नी को दे दिलासा
नन्ही बिटिया है बड़ी भोली
कारगील हो या गेलीपोली
शहीदों को सब देते आदर
आचार्य हो मौलवी फादर
आहुति सब धर्मों की बोली
कारगील हो या गेलीपोली
हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं आकर
जित्वा वा दिल में उतर कर
गीता-बाइबल हमजोली
कारगील हो या गेलीपोली
-हहरिहर झा
झा
*(संगीत-रूप में उपलब्ध)
बचपन की सहपाठिन मिल गई शुरू हुये ईमेल
बीवी ने जब बांच लिये तो खतम हो गया खेल
पूछपरछ मे धमधम गीरते बर्तन के खूब शोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
आफिसगर्ल से पटते पटते जगी हमें कुछ आस
गड़प कर गया बॉस उसे तो हमे न डाली घास
कभी न दोनो मिल पाये फिर नदियों के दो छोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
सेलगर्ल ने बक्सा खोला दिखलाये सब अंग
अर्धागिंनी ने आधे में ही किया रंग मे भंग
तांक-झांक सब ऐसी पकड़ी नजरों के हम चोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
साकी बाला मुफ्त पिला कर कर गई मटियामेट
घर बिज़नेस न छोड़ा हमने उगल दिये सिकरेट
बुद्धि नशे मे भ्रष्ट हो गई मूर्खो के सिरमौर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
- हरिहर झा
Love is an illusion :
hariharjha.wordpress.com
or
http://hariharjha.wordpress.com/2007/06/20/love-is-an-illusion/