खून शहर का निसार
सपनों की लाली पर
मनवा क्यों नाच रहा
शीशे की थाली पर
दारू की बोतल में
जिजीविषा हार गई
फड़फड़ है घायल तन
नाजुक मन मार गई
लुटा गई जिस्म यहाँ
भँवरे की गाली पर
’हाँसिल हो’ ये बुखार
जीते हैं मरते हैं
भूतों के अड्डों में
अट्टहास करते हैं
महलों के ख़्वाब चले
जगते हैं ताली पर
निबटाते काम-काज
थक कर यों चूर हुये
सुस्ताते, सोच रहे
घर से क्यों दूर हुये
मछली से आन फँसे
सिक्कों की जाली पर
- हरिहर झा
नवगीत की पाठशाला से साभार :
http://navgeetkipathshala.blogspot.com/2011/07/blog-post_25.html
http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=2802
♥
आदरणीय हरिहर झा जी
सस्नेहाभिवादन !
बहुत अच्छा लगा आपके यहां आ’कर-
दारू की बोतल में
जिजीविषा हार गई
फड़फड़ है घायल तन
नाजुक मन मार गई
लुटा गई जिस्म यहाँ
भँवरे की गाली पर
कमाल के कथ्य-शिल्प वाले नवगीत के लिए आभार और बधाई !
आशा है , आगे भी आपकी ख़ूबसूरत रचनाओं के लिए आना होता रहेगा …
मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार
Comment by राजेन्द्र स्वर्णकार : rajendra swarnkar — दिसम्बर 8, 2011 @ 1:06 अपराह्न |