बाढ़ ! पलकों पर रूकी कब तक रहोगी?
आँसुओं ! बह जाओ तो अच्छा रहे
क्या पता इक मधुर सी हँसी मिल गई तो
रोक लेगी पलक के ही कोर पर
यन्त्रणा के यन्त्र में घिर कर रहोगी
स्नायुओं के दूर पतले छोर पर
मौत के कीड़े जहाँ पर चुलबुलाते
निकल भागो जल्द तो अच्छा रहे
सुनामियों का ज्वार हो ललाट पर
गुरू-वृन्द को सकून ना आ जाय जब तक
फफोलों में दर्द का लावा पिलाती
हाकिमों को चैन ना आ जाय जब तक
फैंक दो ये सब दवा लुभावनी
मीठी छुरी ललचायें ना अच्छा रहे।
दैत्य पीड़ा दे अगर हँसते रहे
क्या सिमट कर तुम कलपती ही रहोगी
शिष्ट मर्यादा तुम्हे रोकें बहुत
घुटन में रूक कर तड़पती ही रहोगी !
तोड़ निकलो शरम के कुछ डोर यह
सुधि वस्त्र की उलझाये ना अच्छा रहे
-हरिहर झा
सुनामियों का ज्वार हो ललाट पर
गुरू-वृन्द को सकून ना आ जाय जब तक
फफोलों में दर्द का लावा पिलाती
हाकिमों को चैन ना आ जाय जब तक
फैंक दो ये सब दवा लुभावनी…. shaandaar rachna
Comment by rashmi prabha — मई 20, 2011 @ 2:37 पूर्वाह्न |
क्या पता इक मधुर सी हँसी मिल गई तो
रोक लेगी पलक के ही कोर पर
यन्त्रणा के यन्त्र में घिर कर रहोगी
स्नायुओं के दूर पतले छोर पर
behad gahre abhivyakti , aabhar
sadar
Comment by sunil gajjani — मई 20, 2011 @ 8:12 पूर्वाह्न |
मन को व्यथित करते भाव..
Comment by meenakshid — मई 21, 2011 @ 1:19 अपराह्न |
सुनामियों का ज्वार हो ललाट पर
गुरू-वृन्द को सकून ना आ जाय जब तक
फफोलों में दर्द का लावा पिलाती
हाकिमों को चैन ना आ जाय जब तक
sunder panktiyan
aap hamesha hi bahut sunder likhte hain
saader
rachana
Comment by rachana — मई 21, 2011 @ 5:36 अपराह्न |