गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है
ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है
ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता गया अब
बावला रे ! तु चैन से सोना चाहता है
कैद हैं सब टेन्शन टकराते मेरे भीतर
तेज जलता चिराग अब बुझना चाहता है
लुट गई तो न बच सकेगी धरती पे कहीँ
आबरू को डूबाके वो मरना चाहता है
हँस न पाया हँसी कभी मासूम सी जो
भटक कर फूल वो कहाँ बोना चाहता है
चाँद पर रात भर यों काला डामर टपकता
पाप धरती से जो हुये ; धोना चाहता है
-हरिहर झा
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