हरिहर झा

June 11, 2009

मत फेंको जूता

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:51 am

मत फेंको जूता
यह है शिष्टाचार के खिलाफ़
और कानून के विरुद्ध ।

तुम क्षमा कर दो उन्हे
जो हत्या में लिप्त थे
जरा देखो तो सही !
उनके हाथ अब कितने पाक-साफ है !
वे गले में टांगे घूम हैं
निर्दोष होने का प्रमाण-पत्र !

जरा समझो कि
साँस छोड़ती चन्द जिन्दगियां
धन्य हुई
जिनसे चील कौओं ने तुष्टि पाई;
फड़फड़ाती अकुलाती चिड़ियों की वेदना
धन्य हुई
जिनसे गलत में ही सही
प्रतिशोध की हवस पूरी की
बाज ने और गिद्धों ने
जिनके क्रूर नृत्य से डरता है आकाश
तो तुम सह लो और भूल जाओ
क्योंकि तुम्हारे अपनों की याद
मुँह चिढ़ाती है
आइने में नपुंसकता बन कर
इनके ठाठ-बाठ में शरीक हो जाओ
कि ये तुम्हे क्षमा करके पौरुषवान हो गये
फिर से कहता हूँ
मत फेंको जूता

अब तुमने फेंक ही दिया
तो तुम्हारे फटे मौजे के छेद से
नासूर दिखने लगे
जिसकी पीड़ा
कलम बेच खाने वालों को भी हुई
कहने लगे – तुम्हे
कलम की ताकत पर
भरोसा नहीं रहा
उसकी शक्ति हार गई जूते के आगे
तुम्हारे दर्द ने
व्यवस्था पर
जो आक्रमण किया
वही तो किया था
चील कौओं की राजनीति ने
बाज और गिद्धों के स्वार्थ ने
फ़र्क ही क्या रहा?

तो इस सभ्य समाज की
सारी खुशफ़हमियाँ
बनी रहने दो;
चुनाव के रोज
इठलाती उंगली पर लगी
इतराती हुई काली-
स्याही की कसम
मत फेंको जूता !

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/04/blog-post_17.html

http://hariharjha.wordpress.com/

1 Comment »

  1. बेहतरीन…सही कटाक्ष…और सही जगह पकड़ा आपने…बहुत अच्छा लगा

    Comment by विवेक — June 11, 2009 @ 3:27 am |Reply


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