भनक पड़े झरती बूंदों की खिड़की बन्द किया करता
कलरव पंछी का सुन कर भी कितना बोर हुआ जाता हूँ
रिसने लगे पलक से आँसू फूल पत्तियां देख देख
शिकायत भँवरों की गुंजन से लयभंग की मीनमेख
छ्टा निराली छोड़ के नकली चित्रों से मन बहलाया
झूला छोड़ महकती डाली डालर गिनना मुझको भाया
डूब गया नोटों में खड़ी कर दी आट्टालिकायें
जिस्म कैद हथकड़ी बजाता चिल्ला कर गाता हूँ
धूल इकठ्ठी की जीवन में कंकर बस हमने बीने
देख न पाया चांदनी के मृदुल अधर रस भीने
हुआ अनमना, एकाकी बोझिल दिमाग अपना ढ़ोता
कल्पवृक्ष की छाया में भी मृगतृष्णा ही रहा संजोता
नृत्य हो रहा महफिल में मैं दिवास्वप्न में खोया
झनझन डूब गई सिक्कों की खनखन मैं पाता हूँ
हो गई है सुनसान डगर थक चला हूँ सब कुछ हारे
है धुंधलाया आकाश धरा बोझिल है गम के मारे
सूख गया अनुराग ह्दय से बिन बसन्त का मेरा मन
सूरज से गीरता लावा करता महलों का ध्वंस दनादन
हुये तमाशाई तारे दिखलाते दिन में नाटक
भीतर झांक के देखूं जितना गहन तमस पाता हूँ
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/02/blog-post_20.html
http://hariharjha.wordpress.com/2007/12/03/eyes-dripping-tears/
झा जी,
वाकई स्तरीय रचना। बधाई।
Comment by akhileshwar pandey — May 15, 2009 @ 5:58 am |
गहन अवसाद युक्त ह्रदय की पीडा को आपने बड़ी ही सुन्दर और प्रभावी अभिव्यक्ति दी है….सुन्दर रचना…..आभार.
Comment by रंजना. — May 15, 2009 @ 8:53 am |