हरिहर झा

April 3, 2009

मुग्ध हो कर

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:48 am

मुग्ध हो कर देख रहा हूं
और बह रहा हूं
अस्तित्व की बाढ़ में
तेरी अविजित मुस्कान
इधर झनझनाती तंत्रियों में शुरू
सामूहिक गान

तू झुलसा रही मेरे अहं को
उमड़ रहा न जाने क्या
झुकती नज़र, कभी उठती नज़र
पर इसके माने क्या ?

फुलवारी कुछ सिमट गई है
और थोड़ी-सी आहट से
कांपने लगी है
तूफ़ान के अंदेशे ने
क्या क्या जुर्म किये
मजबूर हो गया
खुद को सहने के लिये
क्योंकि बिच्छू ने मारा डंक
पावक चेतना पर
एक एक क्षण का बोझ
वाचाल तन-मन
पर जिव्हा ने एक न कही
नीरवता खाये जा रही
क्योंकि हिमालय खड़ा अपनी जगह
और गगन अपनी जगह
अव्यक्त भाव
मैं पिंजरे में बंद पक्षी
देख रहा हूं क्षितिज की ओर !

-हरिहर झा

*Published in “Hidden Treasure” bilingual  anthology  by Melbourne Poets Association

3 Comments »

  1. पावक चेतना पर
    एक एक क्षण का बोझ
    वाचाल तन-मन
    पर जिव्हा ने एक न कही
    नीरवता खाये जा रही
    क्योंकि हिमालय खड़ा अपनी जगह
    और गगन अपनी जगह
    अव्यक्त भाव
    मैं पिंजरे में बंद पक्षी
    देख रहा हूं क्षितिज की ओर !
    बहुत अच्छा लिखा है। बधाई स्वीकारें।

    Comment by shobha — April 3, 2009 @ 4:20 am |Reply

  2. bahut hi sunder

    Comment by mehek — April 3, 2009 @ 4:23 am |Reply

  3. बहुत बढिया रचना …

    Comment by संगीता पुरी — April 3, 2009 @ 7:40 am |Reply


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