हरिहर झा

March 11, 2009

अभागी मैं

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:36 am
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मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर
मेरा स्वत्व छिन कर ले गये
बेडि़यां उतारने के बहाने
कुछ नई बेडियां जोड़ गये
भोली मैं
अपनी खुशी की दुनियां में
फुदकती रही चहकती रही
अपने केशों को मर्दों की तरह
छोटा कर
जीती रही एक छलावा
पुरूषाये वस्त्र पहन कर
देती रही अपने को
एक भुलावा

भूल गई
घर के साथ दोहरा शोषण
हो रहा आफिस के काम पर
तडा़क सा किया तलाकित
अधिकार देने के नाम पर
ताकि तुम मुझे
सिंगल मदर या
अविवाहित मा के रूप में
छोड़ कर
मुझसे अपनी नजर मुड़ा सको
नन्हा गुल मुझे सौप कर
गुलछर्रे उड़ा सको।

मैं जिन्दा थी
केवल रिश्तों के नाम पर
फूल पत्तियों से लदी
अपनी जड़ से विहिन
पर व्यक्तित्व देने के बहाने
नोचते रहे पत्तियों को मेरी शाखों से
चिपकाते रहे
ब्यूटीसेलुन के लोशन से
नकली फुल मेरी देह पर
प्रतियोगी मापदंड बना कर
निहारते रहे अपनी आंखो से।

वस्त्रों के आवरण पर आवरण
मुझे ओढ़ा दिये थे
स्वामी होने की भावना से
आदिम पुरूष ने
कि कोई मुझे
झपट न ले
बनाये थे काराग्रह मेरे चारो और
मै नाईटक्लब की बाला सी
देखती रह गई
जब तुमने एक एक भारी आवरण को उतार कर
मुझे हल्का किया बादलों सा
पर उतारते उतारते
यह क्या किया तुमने
उतार ली मेरी चमड़ी तक
कभी फेशन के नाम पर
कभी स्वतन्त्रता के नाम पर
और अभागी मै
वस्तु थी
बच्चे की पैदाईश के लिये
वस्तु रह गई
दुनियां की नुमाइश के लिये।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/01/blog-post_6976.html

Let Them Blossom

http://boloji.com/poetry/3001-3100/3061.htm

1 Comment »

  1. भूल गई
    घर के साथ दोहरा शोषण
    हो रहा आफिस के काम पर
    तडा़क सा किया तलाकित
    अधिकार देने के नाम पर
    ताकि तुम मुझे
    सिंगल मदर या
    अविवाहित मा के रूप में
    छोड़ कर
    मुझसे अपनी नजर मुड़ा सको
    नन्हा गुल मुझे सौप कर
    गुलछर्रे उड़ा सको।

    वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति। होली मुबारक।

    Comment by shobha — March 11, 2009 @ 6:56 am |Reply


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