हरिहर झा

January 21, 2009

तेरे विस्मय पर*

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:58 pm

विस्मित हो तुम देख रही हो बहते झरने का पानी
झरने से भी ज्यादा मैं विस्मित हूं तेरे विस्मय पर

घटा समाई जूल्फों में फिर बरस पड़ी बालों से
छेड़ रही बूंदे पानी की फिसल पड़ी गालों से
टुकुर-टुकुर सब देख रहे थे भंवरे गुन-गुन करते
डाली झूम रही लिपट मतवाले आहें भरते

हँसते फूलों को देखा हौले से जब तुम मुस्काई
फूल गीरे पर सबने नज़र उठाई तेरे चेहरे पर

सावन आग लगा बैठा जब नजर मिली इन आंखों से
चौंच भिड़ाते पंछी मोहित फड़क उठे पांखों से
शामत आई जिस पर रूठी चितवन से यों वार किया
नाजुक होंठों को काटा बस दो पल में दुत्कार दिया

बिखरे कांटों पर जब फेंकी तीर सी चुभती हुई नजर
दंश न भूला नजरों का कांटे लगते कोमले मखमल

उल्लास भरा आंखों में बहकी रंगमंच की धारा
सही न जाय अनुभूति अब नहीं सूझता चारा
झिड़क दिया खलनायक को शर्मिन्दा करके घाव दिया
यंत्रवत रहा जड़ अभिनय पर तुमने चेतन भाव दिया

हावभाव देखा नाटक में खुशियाँ आईं गम छाये
अभिनय से तो ज्यादा संवेदन देखा इस मुखड़े पर

-हरिहर झा
*” Hidden Treasure” ( bilingual anthology by Melbourne Poets Association ) में कविता के अंग्रेजी संस्करण के साथ प्रकाशित

January 15, 2009

परिन्दे

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:13 pm
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परिन्दे कभी आकाश में नहीं ढूँढते
नीड़ बसेरा
असुविधाओं पर
गुस्साते नहीं दिल में
हावी होते हवा पर
और पुचकार लेते गगन को

गुजारिश नहीं करते कभी आँधी से
सह लेते सूरज की लू
जो कि करा देती उष्ण-स्नान
जला देती पर के संग पेट की भूख को
तो वे लांछन नहीं लगाते

सो जाते कहीं अंधेरे में
वृत्तियों को सहेजे हुये
सुबकती व्यथाओं को अपने में समेटे
नाप लेते गमों के पहाड़;
वे सपने में नहीं देखते
मालिक होने के गुमान और अरमान
युद्ध और शान्ति के फतवे
नहीं सहेजते
आत्मदाह के साथ
दुनिया नष्ट करने की साजिश
अपने ’पक्षीपने’ से
नहीं करते उजागर दबी पशुता और वह मनुष्यपना

बस सलिके से
सी लेते वेदना को
बेतरतीब कोलाहल में भी
बतियाते रहते चीं चीं
हड़बड़ाना उन्हें नही आया

- हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/09/blog-post_19.html

Read her-teasing-face

http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/

January 8, 2009

यंत्रणा क्यों?

Filed under: हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:33 am

रो पड़ा सुन कर कहानी गहन यह संवेदना
दिल नहीं पत्थर हो वे ना समझ सकते वेदना
भेद खुलवाने को शठ का निहत्थे पर वार हो
यन्त्रणा देता कसाई भोंक रहा कटार हो
पिघलता लोहा जब दिल में मशीनी हथियार हो
बरसता बन दर्द बिजली आग की बौछार हो

दिल को ठंडक दे सकूँ कुछ भी करते ना बना
चोंट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना

रेंगते कीड़ों का आतंक बस गये हैं घाव में
मनोरंजन कर रहे मवाद पीते चाव में
खून ज्यों लावा पिघलता अस्थि मज्जा जल रहे
वायरस उन्माद के धर्मान्धता के पल रहे

लहू के आंसू छलकते जीभ खुलना है मना
चोंट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना

हे विधाता यन्त्रणा क्यों ? बस यही मलाल है
दिया क्यों शरीर? सारे दर्द की जंजाल है

 


मनोवृत्ति परपीड़क शैतान की ही चाल है
मौत से बदतर हुआ इस ज़िन्दगी का हाल है
बस करो पिशाच मानवता के उर को छेदना
चोट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना

 

 

 

    -हरिहर झा

 

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/02/blog-post_260.html

 

 

For “A Prank” and other 50 poems :

 

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=55

 

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January 3, 2009

दूध का ऋण

एक गहन अन्धेरी गुफा से
अपना जीवन चुरा कर
चक्रव्यूह में फंस गया हूं
रोता रहा रात भर
बचाओ ! बचाओ!
वर्जनाओं के घेरे में
दबे पांव चलने के बावजूद
उफनता दूध गीर पड़ा पैरों पर
क्योंकि मां का दूध
चुरा कर ले जा रहा था
बिना ऋण चुकाये

भाग निकला था….
पर आवरण में
कुछ दिखाई न दिया
टहनियों में छुपते छुपाते…
तिमिर इतना गहन कि
डाली काटने के बदले
हाथ काट लिया
फिर अपने से कट कर
मनमानी का अर्थ भी भूल गया
जिसका इल्जाम ढो रहा था
निर्दोष साबित करने में
झुलसाता रहा अपनी अक्ल को
उन्माद प्रतीत होता था सब को
इस भटकन में
डर के मारे
देखता था तिरछी नजरों से
जहां पर सजा कर रखी थी हर चोरी की चीज
जो जबरदस्ती बांध कर
थानेदार ने मेरे भेजे में उतारी थी
वह भी उस भेजे में
जिसमें थी केवल राख
जो नानी माँ ने
घुट्टी में पिलाई थी
चुपके चुपके सरक कर
फैली है बदन में
बनती है राह का रोड़ा
जिससे ठोकर खाये बिना
निकल जाना चाहता हूँ
कि कोई पदचाप भी सुन न ले
पकड़ा न जाऊँ
आखिर तो है जवाब मेरे पास
सब की साजिश का
इस दुनियाँ को ही मार दूँ
खुद मर कर…
पर रोक लेती है माँ मुझे
जाने कहाँ से टपक पड़ी थी
पिछ्ली बार
कंजूस बनिये की तरह
क्योंकि बाकी ही तो था
उसके दूध का ऋण ।

- हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/09/blog-post_05.html

For The Gunpowder Of Abhorrence  Read

http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-gunpowder-of-abhorrence/

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