हरिहर झा

October 15, 2008

नाटक

Filed under: अतुकांत, सृजनगाथा — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:19 am
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नाटक…. विदेश में बस कर आँसू बहाने का… http://www.srijangatha.com/2008-09/august/kavita-%20harihar%20jha.htm

 

 आस्ट्रेलिया आने के नुस्खे http://www.srijangatha.com/2008-09/Sept/austrelia%20ki%20chitthi-harihar%20jha.htm

 

बरसो रे बादल !

 

….बादल के बनने और बरसने का चक्र  चालु रहना  भी आवश्यक है;  प्रवासियों को यह मूलभूत चिन्ता इसलिये सताती है कि यहां का माहौल हर कदम पर भारत का रहन-सहन व संस्कृति को निगलने तैयार बैठा है बल से नहीं, वातावरण के छल से।……

http://www.srijangatha.com/2008-09/oct/austrelia%20ki%20chitthi-harihar%20jha.htm

 

धर्म बनाम संस्कृति

 

….एकदेववाद और बहुदेववाद – इन दो असत्यों में एक को ऊँचा और दूसरे को निकृष्ट समझा जाय तो इसका प्रतिकार तो मुझे करना ही था ।…..

http://www.srijangatha.com/2009-10/march/astrelia%20se.htm

 

 सहा नहीं जाता

 (एक गज़ल)

http://www.srijangatha.com/2009-10/June/chand-gazal_harihar_jha_1.htm

 

झूठ के भीतर

 

शेक्सपीयर की एक सोनेट को हिन्दी में पढ़िये….

 

http://www.srijangatha.com/2009-10/June/bhashantar-harihar_jha_1.htm

 

दोपहर की चाय

 

…रंगे सियार की भांति मुझे भी अपनी स्वाभाविक आदत को अभिव्यक्ति देने की हूक उठी । सोंचा – एक कप चाय बना करके कर दे अपने अरमान पूरे ।….

http://www.srijangatha.com/2009-10/June/shesh-vishesh_Australia_se_harihar_jha_3.htm

 

 

 

 

October 1, 2008

कौन सही? कौन गलत?

लावारिस हवाओं की थपेड़े खाती गर्द में
लोटपोट होता
बेशर्म मौसम का सरकता पल्लु
अब विलुप्त हुआ लजाती दुल्हन का रूप
और लहलहाती फसल का समां
गया वो भीनी भीनी हवाओं का
संगीत – सुरमय ।

अब अंगूरी खेतों की रखवाली करते
लपलपाते कुत्तों की बेताब आत्मा
हड्डी से भूख बढ़ा कर
खेल रही
मांस नोचने का खेल
दातों से चबा कर
मासूमियत को
उदर के हवाले करती ।

इधर सूअर के बच्चों से सीखते
हलाहल में अमृत तलाशते जीव
बदबू के साथ साथ
बदबू फैलाने का इल्जाम भी
ढो रहे हैं
इधर देख लो
खुद ही गवाही देकर
अपना निर्णय सुनाने को
एकत्र हुये असंख्य गजराज
जिनकी पवित्र वाणी पर
कीचड़ उछालते
दलदल में से उभरते
कीड़ों का उफान !
जो कुलबुला कर
महज गन्दगी फैंकते हैं
साफ सुथरी नाक में एकत्र हुई
घ्राण शक्ति पर !

इसमें कौन सही? कौन गलत?
खुद देख लो
चांदी की डंडी वाले तराजू में
जहां मुर्दा लाश पड़ी
शब्दों की हर पंक्ति का पलड़ा
जीवन्त शिशु से भारी ।

-हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/08/blog-post.html

http://poetry.com/Publications/search.asp?First=harihar&Last=jha&submit.x=30&submit.y=11
http://boloji.com/writers/hariharraijha.htm
http://hariharjha.wordpress.com/
http://www.kritya.in/0201/En/poetry_at_our_time11.html

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