सनक गई सकून मिला अन्धेरे से उजाले तक
दावा नहीं दया पहुंची जीगर के छाले तक
लेपटोप पंहुच गये गांव में बस्ती में
मोबाइल हथेली में सब्जी दूध वाले तक
हेरी पोटर देख-देख सर्पीली तेज हवा चली
फैल गया दंश लहू में गोरे तक, काले तक
झेलते रहे भिड़न्त इस दुनियां के खेल में
तो गेंद देखो आ पहुंची दुश्मन के पाले तक
खूब नहाई लतिका भीग कर बारीश में
बेहया लाज बह गई नदी तक नाले तक
फंफूदी भरी थी मन में; साफ हुआ किस तरह !
झटक के झाडू पहुंचा मकड़ी के जाले तक
दरवाजे पे गमगीन हुये गोता हमने यूं खाया
कि चाबी पंहुच ही गई लटकते ताले तक
-हरिहर झा
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/blog-post_02.html
For “The weather” :
http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=33
बढ़िया है. लिखते रहें.
Comment by समीर लाल — June 17, 2008 @ 12:55 pm |
क्या बात है हरिहर जी…बिल्कुल निराला अंदाज़ है आप के लेखन का….बहुत पसंद आया. लिखते रहें ऐसे ही.
नीरज
Comment by neeraj1950 — June 17, 2008 @ 1:04 pm |