हरिहर झा

May 16, 2008

कामदेव

Filed under: गीत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:54 am
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संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला
आँच नियन्त्रण से बाहर हो कर ना दे मुंह काला

मूरत देखी खजुराहो में आसक्ति की माया
कत्थक हो या भरतनाट्यम वही भाव तो छाया
अनुभूति हो अभिव्यक्त तो जीवन मीठी बानी
दमन किये दिल रहा भटकता प्यासा मांगे पानी

तपती आंच में रहा उबलता फफक उठा तब छाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला

प्रीत बिना बेचैन रहा दिल दौड़ा था दिन रात
ऋषि मुनि के संयम को यह पशु दे गया मात
मिलने को लैला से मजनू मारा मारा फिरता
सोये लेकर नशा वासना अंधकूप में गीरता

सपने में बन सांप डराये किस कुतिया को पाला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला

कुरेद कर भीतर से कोई व्यर्थ अड़ाये टांग
होती नादानो सी हरकत़ खाली जैसे भांग
प्रेम का स्वांग रचा कर लेता कामदेव प्रतिशोध
जोश खो गया होंश ना रहा कहां ज्ञान का बोध

दबी भावना पर शोभित था शर्म हया का ताला
संयत देह के भीतर कैसी धधक रही है ज्वाला

- हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/04/blog-post_04.html

 

Hobbits disappeared! Why and How? :

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=53
OR
http://hariharjha.wordpress.com/

2 Comments »

  1. वाह!!

    Comment by समीर लाल — May 16, 2008 @ 1:59 am

  2. Somehow i missed the point. Probably lost in translation :) Anyway … nice blog to visit.

    cheers, Seeder.

    Comment by Seeder — June 19, 2008 @ 6:25 am

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