हरिहर झा

April 16, 2008

बेकार की बला

Filed under: हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:46 am
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एक पंखुड़ी का आलिंगन करती
भारी भरकम काया
लो चील ने फैला दिये अपने डैने
मंडराया अंधियारे का साया

निर्दयी सांपों की तरह घेरते
तमाशबिनों का नाच
रोती चिल्लाती लज्जा से
दरिंदे पाते आंच

खिलखिलाहट करती प्रेतात्मायें अब
मौत का इश्तिहार टांगती
जीती जागती लाश से
उसके लहू-मांस का हिसाब मांगती

चोंट के निशान से क्षतविक्षत शरीर
अंधियारे ढंक रहे घाव
तरस खाकर दुर्गन्ध करती
शरीफ नजरो से बचाव

क्या लेना देना किसी से ?
क्यों इन मच्छरों को लाश पर से भगाना !
मुनासिब नहीं दुनियांदारी से बाहर
कोईं बेकार की बला गले लगाना (??)

- हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/03/blog-post_07.html

 

 

For “A Prank” and other 50 poems :

 

http://poetry.com/Publications/display.asp?ID=P7382407&BN=999&PN=55

 

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http://hariharjha.wordpress.com/

 

2 Comments »

  1. बहुत उम्दा, वाह!!

    Comment by समीर लाल — April 16, 2008 @ 4:49 am

  2. मर्मस्पर्शी रचना।

    Comment by mamta — April 16, 2008 @ 12:25 pm

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