हरिहर झा

March 16, 2008

यंत्रणा क्यों?

रो पड़ा सुन कर कहानी गहन यह संवेदना
दिल नहीं पत्थर हो वे ना समझ सकते वेदना

भेद खुलवाने को शठ का निहत्थे पर वार हो
यन्त्रणा देता कसाई भोंक रहा कटार हो
पिघलता लोहा जब दिल में मशीनी हथियार हो
बरसता बन दर्द बिजली आग की बौछार हो

दिल को ठंडक दे सकूँ कुछ भी करते ना बना
चोंट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना

रेंगते कीड़ों का आतंक बस गये हैं घाव में
मनोरंजन कर रहे मवाद पीते चाव में
खून ज्यों लावा पिघलता अस्थि मज्जा जल रहे
वायरस उन्माद के धर्मान्धता के पल रहे

लहू के आंसू छलकते जीभ खुलना है मना
चोंट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना

हे विधाता यन्त्रणा क्यों ? बस यही मलाल है
दिया क्यों शरीर? सारे दर्द की जंजाल है
मनोवृत्ति परपीड़क शैतान की ही चाल है
मौत से बदतर हुआ इस ज़िन्दगी का हाल है

बस करो पिशाच मानवता के उर को छेदना
चोट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना
    -हरिहर झा

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For “A Prank” and other 50 poems :

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