हरिहर झा

March 3, 2008

टीस

पड़ोस की वह अन्धी लड़की
पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?
टीस उठती  है मेरे दिल में
इतना  भी नहीं जान पाती वह
और जान कर करेगी भी क्या ?
देखने से तो रही बिना आंख के
वैसे वह  जन्म से अन्धी नहीं
सहपाठिन थी  मेरी
केमेस्टी की प्रयोगशाला में
हुई  एक दुर्घटना
ऐसी अफवाह है
कि थी किसी की शरारत
पर जब वह पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?
फटती हैं मेरे दिल की नसें
चीर जाती हैं सीने की पसलियां
निकलती पीड़ा की बूंदें
समा जाती रक्त में
मैं पागल हो उठता हूँ  ।

कभी कभी सोंचता हूँ
क्यों न उसके इलाज का खर्च भी
मैं उठा लूं
पर इतना भी संवेदना में
बह जाना
ठीक नहीं
क्यों कि इसमें मैंने… मैंने…
क्या किया था
इसका प्रमाण भी क्या है
कौन जानता है इसे?
हां,  जो मैं भुगत रहा हूँ
इसका नाम है कुछ 
गर्मी दिमाग में
कि लपलपाती  वेदना की भाप
फेफड़ों से बाहर निकलने पर
श्वांस नली
चिल्लाती है
ऐसी टीस उठती है । 

     - हरिहर झा

http://merekavimitra.blogspot.com/2007/12/blog-post_27.html#hariharj

  

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3 Comments »

  1. लिखने के लिए कोई शब्द नहीं हैं ।
    घुघूती बासूती

    Comment by ghughutibasuti — March 3, 2008 @ 9:01 am

  2. इसका नाम है कुछ
    गर्मी दिमाग में
    कि लपलपाती वेदना की भाप
    फेफड़ों से बाहर निकलने पर
    श्वांस नली
    चिल्लाती है
    ऐसी टीस उठती है ।

    —बहुत उम्दा.

    Comment by समीर लाल — March 3, 2008 @ 3:52 pm

  3. bahut hi prabhvshali,padhnewale ke man mein tis uthati hai.

    Comment by mehhekk — March 3, 2008 @ 5:20 pm

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