हरिहर झा

February 20, 2008

मधुशाला के नाम

 चंचल आंखों की पीड़ा से छलक रहा क्यों जाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
  
कैसे बच पायेगा पंखी ठगी हुई सी आंखें
छाया विष हलाहल नभ में उड़ती दोनो पांखें
गले तीर के लग जाने के कैसे ये अरमान
चीर कलेजा क्षुधा मिटाने की मन में ली ठान

नरक बनी दुनिया सपने में आती स्वर्ग समान
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम

मानमनावन कैसे हो दिल में हसरत की आग
अधर मौन होकर सोचे अब जागे मेरे भाग
दिल डूबा गहराई में भावों के स्वप्निल पंख
ओले बन अंगारे बरसे कलियां मारे डंख

शीतल छांव के दो पल, बदले में वियोग हाय राम !
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम

खड़ा हुआ खलनायक देखो, बन कर भाग्य विधाता
हाय ! विदूषक मसखरी करता, सब्ज बाग दिखलाता
ठौर ना मिला प्रेम को, छलनी हुआ गया अब चैन
कैद हो गया अपराधी सा, अश्रुपूरित नैन

अमृत की दो बूंद जहर से मिल कर काम तमाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम

Why Torture?

http://hariharjha.wordpress.com/2008/02/19/why-torture/

OR

http://hariharjha.wordpress.com

2 Comments »

  1. बहुत अच्छा लगा झा जी, पढ़ कर।

    Comment by Gyan Dutt Pandey — February 20, 2008 @ 1:16 am

  2. कैसे बच पायेगा पंखी ठगी हुई सी आंखें
    छाया विष हलाहल नभ में उड़ती दोनो पांखें
    गले तीर के लग जाने के कैसे ये अरमान
    चीर कलेजा क्षुधा मिटाने की मन में ली ठान
    bahut dil ko chu lene wali panktiyan,kavita bahut sundar shabdon ke mala ke saath bani hai,its beautiful.

    Comment by mehhekk — February 20, 2008 @ 4:06 pm

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