चंचल आंखों की पीड़ा से छलक रहा क्यों जाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
कैसे बच पायेगा पंखी ठगी हुई सी आंखें
छाया विष हलाहल नभ में उड़ती दोनो पांखें
गले तीर के लग जाने के कैसे ये अरमान
चीर कलेजा क्षुधा मिटाने की मन में ली ठान
नरक बनी दुनिया सपने में आती स्वर्ग समान
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
मानमनावन कैसे हो दिल में हसरत की आग
अधर मौन होकर सोचे अब जागे मेरे भाग
दिल डूबा गहराई में भावों के स्वप्निल पंख
ओले बन अंगारे बरसे कलियां मारे डंख
शीतल छांव के दो पल, बदले में वियोग हाय राम !
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
खड़ा हुआ खलनायक देखो, बन कर भाग्य विधाता
हाय ! विदूषक मसखरी करता, सब्ज बाग दिखलाता
ठौर ना मिला प्रेम को, छलनी हुआ गया अब चैन
कैद हो गया अपराधी सा, अश्रुपूरित नैन
अमृत की दो बूंद जहर से मिल कर काम तमाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
Why Torture?
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( अति मह्त्वाकांक्षी लोग… क्या क्या गुल खिलाती हैं उनकी हीन ग्रन्थियां…)
पिकनिक पॉइन्ट पर खड़ा
मैं देख रहा
ढलकता पानी जलधारा का
मैं छूना चाहता झिझकती उंगलियों से
टपकती करूणा इन बूंदों से
गिरती खाइयों में
जिसकी गहराइयां भयदायी
पर कुछ बूंदो की लपटें
महत्वाकांक्षा लिये
वाष्पिभूत होकर
उठी आकाश की ओर।
मैं ही हूं वाष्पिभूत जल
ऊपर को उठता हुआ
क्यों समझते तुम मुझे
क्षुद्र और नीचा !
देखता हूँ
न जाने क्यों
नीचे रह गये
कीड़े-मकोड़े आनंदित हैं
मैं जल रहा नन्हेपन की पीड़ा में
घनीभूत हो रहा
ओछेपन का भाव
और सूइयां चुभती
हीन ग्रन्थि की
मैं चिल्लाता हूं
देखो , मुझे देखो
मेरी ऊँचाई !
पर मग्न हो तुम स्वयं में
विनाशकारी धारा से अनजान
बिजली के तार पर
बैठी चिड़िया की तरह;
मैं भी चहचहाना चाहता
कुछ परागकण
फैलाता वायुमण्डल में
बिखरा देता कुछ बीज धरती पर
मकसद वही
विशाल वृक्ष से प्रतिस्पर्धा करने ।
मेरे कम्प्यूटर का की बोर्ड
उपहास करता
मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु
निकली कीबोर्ड के बल्ब की चमक
आत्मसात होने
दूर गगन की
निहारिका की ओर
रह गई आधी अधूरी
धुयें की लकीर का छोर
इस ओर |
-हरिहर झा
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