हरिहर झा

December 12, 2007

मुसाफ़िर

माना ये जग है सफर चार दिन का
हम हैं मुसाफिर ये मेला छूटेगा
जब होगा धमाका मौत छीन लेगी
खाली हाथ जाते दिल भी टूटेगा

पंडित बताते मत करो हाय तौबा
धरो हाथ पर हाथ, सब कुछ वो देगा
दे डालो सब कुछ, शिकायत करो ना
अन्त में ईश्वर परीक्षा भी लेगा

माना ये जग है सफर चार दिन का
सफर तक में बैठने को सीट भी चाहिये
जग की यात्रा में नहीं हम जानवर
इन्सानो जैसी जिन्दगी भी चाहिये

वातानुकूलित हैं शयनकक्ष तुम्हारे
मत सिखाओ हमको सबक जिन्दगी का
इन्तजाम खुद के लिये हर सुख सुविधा
भाषण क्या खूब! खुदा की बन्दगी का

माना ये जग है सफर चार दिन का
गम हों भले हम तो खुशियां भी चाहें
बकवास कोरी और लिबास दर्शन का
भटका नहीं सकता हमारी राहें

- हरिहर झा

http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/10/blog-post_4922.html

Express your view on :
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/15/since-i-left-the-caves/

http://hariharjha.wordpress.com

No Comments »

No comments yet.

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Powered by WordPress.com