नादान बच्चे
पहन कर मुखौटा
डराते फिरते है
नहीं जानते वे
उनके डराने की प्रवृत्ति भी
एक तरह से भीतर का घमंड है
वे मेरी तरह विनम्र होना नहीं जानते
अब मुझे ही देखिये
मैं एक आदर्श पिता
आदर्श पति और पुत्र
मेरे भीतर कुछ बाहर कुछ
ऐसा कभी नहीं होता
क्योंकि मैं मुखौटों को
हाथ नहीं लगाता
मैं तो सुक्ष्म स्तर पर भी
मुखौटों के विरूद्ध हूं
इतना कि
विचार स्वतंत्रता की ऐसी ध्वजा फहराता
कि बिल्कुल पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर
बनता हूं कभी संघी
कभी कम्यूनिस्ट के साथ
भले ही फायदा देख कर ;
चल जाता इसलिये
अपना सिक्का खोटा नहीं
और मेरे विचार कोई मुखौटा नहीं
इस मुखौटे से बँधा मेरे पीछे कोई
धागा नहीं
और चमड़ी के भीतर मैंने
ट्रांसप्लांट करवाया एक मुखौटा
और उसके ऊपर दूसरा
बुरी तरह
चिपक गया हो पड़े-पड़े
ऐसा भी नहीं
क्यों कि उसे बदलना हो तो झंझट
बैठे बिठाये ;
नहीं, मुझे सख्त नफरत है
मुखौटों से
दूर बैठे नादान बच्चे
न जाने
क्यों खेलते हैं
मुखौटों से ।
- हरिहर झा
http://bhomiyo.com/hi.xliterate/merekavimitra.blogspot.com/2007/11/blog-post_6500.html#hariharj
For Ram and Ravan click on:
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/15/ram-and-ravan/
good one….
Comment by KEERTI VAIDYA — December 6, 2007 @ 5:06 am |