हरिहर झा

November 29, 2007

प्यार गंगा की धार

Filed under: काव्यालय, गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:14 am
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रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार
बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार

   
भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार
भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार

    
भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार
माँ की लीला कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार

   
प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार
छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार

  
क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम -
पुष्प के रस का तार
बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।

                -हरिहर झा

http://manaskriti.com/kaavyaalaya/pyaar_gangaa_kee_dhaar.stm
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2 Comments »

  1. प्यार गंगा की धार। —–पावन प्यार की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !
    जहाँ काम, क्रोध, मद, लोभ हो वहाँ प्यार होता ही नहीं..!

    Comment by मीनाक्षी — November 29, 2007 @ 4:11 am |Reply

  2. धन्यवाद मीनाक्षी जी
    यहां पर मैंने काम व लिप्सा को भिन्न भिन्न द्रष्टि से लिया है

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — December 6, 2007 @ 4:33 am |Reply


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