धरा पर गगन
खुशियों की बौछार खिलखिलाता मौसम आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया
देवालय पर पूर्ण चन्द्रमा अनहोनी यह बात
दीप जल रहे लगता निकली तारों की बारात
फुलझडि़यों की माला निहारिकाओं का आभास
फूट रहे पटाखे बम चलते कदमों के पास
युवकों की शरारत मस्ती का आलम छाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया
चरणों में लक्ष्मी मैया के झुक झुक जाता माथ
मिठाइयां सूखे मेवे ले लेते भर भर हाथ
भागे दुख जंजाल छा गई दीप पर्व की माया
गोल घूम रहे ग्रह नक्षत्र स्वर्ग यहां लो आया
इन्द्रलोक की उर्वशी का नृत्य उतर आया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया
खेल रहे खिलौनों से बन वायुयान के चालक
नई नई पौशाक अकड़ते खेल रहे हैं बालक
इन्तजार था महिनों से कि कब आये दिवाली
लटक मटकते झूम बजाते दो हाथों से ताली
तोतली बोली शिशुओं की कितना आनन्द समाया
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया।
- हरिहर झा
http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/shubh_deepawali/hariharjha.htm
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/smiled-the-sun/
OR
दीपावली का एकदम जीवंत वर्णन । बधाई ।
Comment by आशा जोगळेकर — November 15, 2007 @ 12:45 am
अच्छे भावों वाली कविता.
Comment by kakesh — November 15, 2007 @ 12:49 am
आशाजी , काकेशजी
धन्यवाद
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — November 15, 2007 @ 2:53 am
उड़ता है मन मगन धरा पर गगन उतर आया. — बहुत सुन्दर शव्द रचना .
प्रकृति और पर्व का सुन्दर मेल देखने को मिल रहा है.
Comment by मीनाक्षी — November 15, 2007 @ 3:47 am
धन्यवाद मीनाक्षी जी
इस बहाने आपकी कविता व टिप्पणियां पढ़ने का भी मौका मिल जाता है
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — November 15, 2007 @ 11:16 pm