मै जब खाली पेट था
भूखा ! सिर्फ भूखा !
नहीं जानता था
क्या होता है सिर दर्द
दिल मे लिये फिरता था
सिर्फ प्यार का दर्द
हाँ अब, जब खट्टी डकारे लेता हूं
कल का भोजऩ कोई छीन न ले
इस चिन्ता मे व्यस्त रहता हूं
तब चुभ रहा है तीर
दर्द से फटा जाता है सिर ।
पर कहते हैं इस युग में
दर्द को संवेदना नहीं
अनुभूति नहीं
बिल्कुल जड़ समझो ।
किसी सड़े हुये सेव की तरह
या गले मे अटकी गोटी की तरह
वस्तु समझो और
गोली खाकर
गोटी को निकाल फेको ।
तो गुब्बारा हुये इस पेट का दर्द
लगता है सड़ा हुआ सेव
न्यूटन से पुछ कर
सिर से गिर कर
पेट मे उतर आया
सेव फट कर
ज्यों मिट्टी मे मिला
शुरू हुआ बदन दर्द ।
आखिर यह दर्द है क्या !
बस, काया से मस्तिष्क तक
न्यूरोन से गुजरती यात्रा ।
न्युरोन को पकड़ा पर
दर्द कहां पिट पाया
बिजली को धूल माना
पर दर्द कहां मिट पाया ।
-हरिहर झा
http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time5.html
नोट: भॊतिकी जानने वालों के लिये:
बिजली को धूल माना
= तरंग को कण माना = wave को particle माना
कविता इस परिप्रेक्ष्य में लें
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एक आह निकल गई, हरिहर भाई. बहुत खूब.
Comment by समीर लाल — October 18, 2007 @ 1:13 am |
धन्यवाद समीर जी
इस बार दर्द को दिल के साथ साथ दिमाग से भी देख्नना पड़ा।
Comment by हरिहर — October 18, 2007 @ 1:33 am |
हरिहर जी ,
दर्द न पिटता है , न मिटता है , हमसे लिपट कर हमीं मे सिमट जाता है.
“पर कहते हैं इस युग में
दर्द को संवेदना नहीं
अनुभूति नहीं
बिल्कुल जड़ समझो ।” बिल्कुल सत्य वचन… !
Comment by मीनाक्षी — October 18, 2007 @ 7:43 am |
धन्यवाद मीनाक्षी जी
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — October 19, 2007 @ 12:18 am |