रूह में लपेट कर
धुंआ धुआं हो रहा श्मशान की ओर
पालकी में बैठी दुल्हन
अपने आंचल में सपने संजोये
मृगनयनो से अपने पुरूष को निहारती
एक बर्फीली आंधी से अनजान
रसवन्ती उमंगो से भरी
पपीहे की ओर इशारा करती
खो गई घुमड़ती घटाओं में
जब कि मलमल के रेशों में छुपी
जर्जर खटिया में फंसती कोमल त्वचा
अभ्यस्त हो गई पीड़ा के लिये
पर यह छलावा…
और आस्था को हिलाती
बनावटी प्यार की आतुरता
और इसके
रेशमी स्वप्नों से निकलते कांटे
हो गये असहनीय !
ह्दय की व्यथा को डूबोती
वेदना और आंसुओं में
यह तन्हाई
और दिल की हसरतें !
नये युग की आंधी से
उठी कलम ने
श्मशान की आग को
स्थानान्तरित किया
बस बुझाया नहीं….
उसे अपनी रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह !
गजब की हिम्मत
चुकाई भारी कीमत
श्मशान की आग को
रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह !
-हरिहर झा
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गजब की हिम्मत
चुकाई भारी कीमत
श्मशान की आग को
रूह में लपेट कर
सफल हो सकी वह !
—आहह!! बहुत गहरी अभिव्यक्ति!! क्या कहें.
Comment by समीर लाल — October 11, 2007 @ 1:12 am
भाई समीर, धन्यवाद.
Comment by हरिहर — October 11, 2007 @ 1:39 am
जब कि मलमल के रेशों में छुपी
जर्जर खटिया में फंसती कोमल त्वचा
रेशमी स्वप्नों से निकलते कांटे
हो गये असहनीय !
अलंकारो के साथ विरोधाभास - रहस्यवाद को समझने के लिए दो-तीन बार कविता पढ़ी.
कुछ कविताओ की व्याख्या भी हो तो आम पाठक को समझने मे सरलता होगी.
Comment by meenakshi — October 11, 2007 @ 3:13 am
मीनाक्षीजी, धन्यवाद। व्याख्या केवल पाठकों के जरिये हो सकती है।
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — October 11, 2007 @ 3:51 am