हरिहर झा

October 4, 2007

मां और मातृभूमि

Filed under: तुकान्त, रचनाकार — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:14 am
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( एक प्रवासी भारतीय के द्रष्टिकोण से )

छुटा देश तो जीना दूभर  दुखड़ा किससे कहना 

माया मोह की गठरी लादे सुख दुख इसके सहना

     

समझे दर्द  न दिल का कोई घूटी  रही अभिलाषा

मातृस्नेह की एबीसी मे कैसे हो सकती परिभाषा

रहा न अपना,  देश पराया अपना लेने का बीड़ा

याद क्यों आई? मां  ने जन्म दिया था उसकी पीड़ा

  

मां का गर्भ था स्वर्ग के जैसा,  छाया परमानन्द

शयनकक्ष की अद्भूत निंद्रा, सुख सुविधा मे बन्द

  

माता का लहू पोषण देता भूख लगी और तृप्ति

मां की धमनी पीपल छैयां कष्ट गया निवृत्ति

सांस लिये का श्रम न जहां हो जब पूरा आराम

मां की धड़कन गीत बना बस सुना सुबह और शाम

   

केवल नौ महिने क्या बीते मां हो गई मजबूर

प्रसव की पीड़ा भोगी खुद और किया स्वयं से दूर

   

जो दिवारें पाल पोस कर बांटती सुख आनन्द

देती धक्का शर्मसार हो रह न सका मैं बन्द

निकल न पाऊं, रह ना पाऊं अद्भूत रही सुरंग

ममता खदेड़ रही क्यों मुझको छिड़ी हुई क्यों जंग

   

शिशु जन्म ले इसमे चाहे हों जितने संताप

मातृभूमि को छोड़ विदेश मे बसना है क्या पाप ? 

   

प्रेरणा :  राहुल सांकृत्यायन -http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/ghummakkad/ghummakad1.htm

http://rachanakar.blogspot.com/2007/08/maa-aur-matrubhoomi.html

 

For Lotus in the Mud

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8 Comments »

  1. सब जीवन के खेल हैं मित्र. जो भी मातृभूमि से दूर हैं सभी प्रवासी है -कोई सरहद के पार कोई सरहद के भीतर. प्रवास तो प्रवास है और दर्द भी एक से.

    Comment by समीर लाल — October 4, 2007 @ 12:58 am

  2. बस तुकांत है। बाकी न तो प्रवासी के दर्द की अनुभुति है और न ही कहीं से कविता बन पाई है। क्षमा कीजिएगा झा जी, मामला जमा नहीं।

    Comment by अनिल रघुराज — October 4, 2007 @ 1:25 am

  3. अनिल जी धन्यवाद
    प्रवासी का दर्द अभी तक भोग रहा हूं
    पर मेरा आशय केवल दर्द अभिव्यक्त कर के आंसू बहाना नहीं है।
    प्रवासी भाइयों को अपराध भाव से मुक्ति दिलाना है जो जाने अनजाने
    हम पर थोप दिया जाता है
    मैं राहुल सांकृत्यायन से प्रभावित हुआ हूं कृपया पढ़िये:

    http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/ghummakkad/ghummakad1.htm

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — October 4, 2007 @ 2:08 am

  4. समीर जी , आपने तो दिल को छुने वाली बात कह दी।

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — October 4, 2007 @ 2:15 am

  5. किसी ने क्या खूब कहा है - रोटी अपने घर में भी है

    Comment by Annapurna — October 4, 2007 @ 8:28 am

  6. अन्नपूर्णा जी
    कविता का आशय इससे उल्टा है
    कृपया राहुल सांकृत्यायन के लेख पर क्लिक करें

    http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/ghummakkad/ghummakad1.htm

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — October 4, 2007 @ 9:32 am

  7. मैंनें कविता की अंतिम पंक्ति पर टिप्पणी की थी।

    Comment by Annapurna — October 12, 2007 @ 6:01 am

  8. कथन स्पष्ट करने के लिये धन्यवाद

    Comment by Harihar — October 13, 2007 @ 8:25 am

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