हरिहर झा

October 31, 2007

प्रिये तुम्हारी याद

Filed under: अनुभूति, गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:15 pm
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प्रेम पाशमय जीवन सुना कर जाने के बाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
झिलमिल स्मृति चित्र उभरते और सताते मुझको
अकुलाए से पंथ प्यार की राह जताते मुझको
झूम रहे वे नयन चकोरे मुस्काते फूलों में
झुला रहे मदभरे प्यार से हिलमिल के झूलों में

  
स्वर मधुर सब तेरे लगते सुन विहंग के नाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

  
व्यथित नयन बस जगे जगे से एक झलक की आस
रूप गंध कुछ स्पर्श  नहीं इस तनहाई के पास
स्वप्नों में जी भर देखा पर बुझी न उर की प्यास
दिवास्वप्न बुन बुन  कर मेरी पीड़ा बनी उदास

  
सहा न जाता एकाकी पल घिर आया अवसाद
महक उठी नन्हीं बगिया में प्रिये तुम्हारी याद

       -हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/priye.htm

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October 24, 2007

फ्रायड ने देखा एक ख्वाब

फ्रायड ने देखा एक ख्वाब

मनुष्य जाति

जो मनोरोगों से ग्रस्त

मानसिक विकारों से त्रस्त

कैसे जगे बीमारी को

दूर भगाने की आस

हो हर ताले की

कुंजी उसके पास

  

फिर सपने मे देखा

झोली या डंडा

मुर्गी या अंडा

अंडे का फंडा

प्रत्येक का जरूर कोई अर्थ

लाठी नाग तलवार या चाकू

कूआ, खाई,  पहाड़ या राई

सब कुछ यौन पिपासा

सर्व  सेक्समयं जगत

सदा से भीतर की कुण्ठायें रोई

जब चेतन मन  बिल्ली की नींद सोया

दमित वासऩा  का चूहा

चुपचाप

अपना भेष बदल कर निकला

मानो फ्रायड ने

चतुर बिल्ली की तरह

नींद का ढ़ोग रच कर

जान लिया  चूहों का राज।

दंग रह गया फ्रायड

मन की गहराईयां बतलाते

ये सपने कितने सच्चे !

कि जैसे निरदोष बच्चे

बाकी झूठा इंसान

झूठी यह दुनियां।

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October 18, 2007

दर्द का दर्द

मै जब खाली पेट था
भूखा !   सिर्फ भूखा !
नहीं जानता था
क्या होता है सिर दर्द
दिल मे लिये फिरता था
सिर्फ प्यार का दर्द

हाँ अब, जब खट्टी डकारे लेता हूं
कल का भोजऩ कोई छीन  न ले
इस चिन्ता मे व्यस्त रहता हूं
तब चुभ रहा है तीर
दर्द से फटा जाता है सिर ।

पर कहते हैं इस युग में
दर्द को संवेदना नहीं
अनुभूति नहीं
बिल्कुल जड़ समझो ।
किसी सड़े हुये सेव की तरह
या गले मे अटकी  गोटी की तरह
वस्तु  समझो और
गोली खाकर
गोटी को निकाल फेको । 
तो गुब्बारा हुये इस पेट का दर्द  
लगता है  सड़ा हुआ सेव
न्यूटन से पुछ कर
सिर  से गिर कर
पेट मे उतर आया
सेव फट कर
ज्यों मिट्टी मे मिला  
शुरू  हुआ बदन दर्द  ।

आखिर यह दर्द  है क्या !
बस, काया से मस्तिष्क तक
न्यूरोन से गुजरती यात्रा । 

न्युरोन को पकड़ा पर
दर्द  कहां पिट पाया
बिजली को धूल माना
पर दर्द  कहां मिट पाया ।

      -हरिहर झा

http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time5.html 

नोट: भॊतिकी जानने वालों के लिये:

बिजली को धूल माना
= तरंग को कण माना
= wave  को  particle  माना 

कविता इस परिप्रेक्ष्य में लें

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October 10, 2007

रूह में लपेट कर

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 11:43 pm
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 धुंआ धुआं हो रहा श्मशान की ओर
पालकी में बैठी दुल्हन
अपने आंचल में सपने संजोये
मृगनयनो से अपने पुरूष को निहारती
एक बर्फीली  आंधी से अनजान
रसवन्ती उमंगो से भरी
पपीहे की ओर इशारा करती
खो गई घुमड़ती घटाओं में
     
जब कि मलमल के रेशों में छुपी
जर्जर खटिया में फंसती कोमल त्वचा
अभ्यस्त हो गई  पीड़ा के लिये
पर यह छलावा…
और  आस्था को हिलाती
बनावटी प्यार की आतुरता
और इसके
रेशमी स्वप्नों से निकलते कांटे
हो गये असहनीय !
ह्दय की व्यथा  को डूबोती
वेदना और आंसुओं में
यह तन्हाई
और दिल की हसरतें !
       
नये युग की आंधी से
उठी कलम ने
श्मशान की आग को
स्थानान्तरित किया
बस बुझाया नहीं….
उसे अपनी रूह में लपेट  कर
सफल हो सकी वह !
गजब की हिम्मत
चुकाई भारी कीमत
श्मशान की आग को
रूह में लपेट  कर
सफल हो सकी वह !

-हरिहर झा


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October 4, 2007

मां और मातृभूमि

Filed under: तुकान्त, रचनाकार — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:14 am
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( एक प्रवासी भारतीय के द्रष्टिकोण से )

छुटा देश तो जीना दूभर  दुखड़ा किससे कहना 

माया मोह की गठरी लादे सुख दुख इसके सहना

     

समझे दर्द  न दिल का कोई घूटी  रही अभिलाषा

मातृस्नेह की एबीसी मे कैसे हो सकती परिभाषा

रहा न अपना,  देश पराया अपना लेने का बीड़ा

याद क्यों आई? मां  ने जन्म दिया था उसकी पीड़ा

  

मां का गर्भ था स्वर्ग के जैसा,  छाया परमानन्द

शयनकक्ष की अद्भूत निंद्रा, सुख सुविधा मे बन्द

  

माता का लहू पोषण देता भूख लगी और तृप्ति

मां की धमनी पीपल छैयां कष्ट गया निवृत्ति

सांस लिये का श्रम न जहां हो जब पूरा आराम

मां की धड़कन गीत बना बस सुना सुबह और शाम

   

केवल नौ महिने क्या बीते मां हो गई मजबूर

प्रसव की पीड़ा भोगी खुद और किया स्वयं से दूर

   

जो दिवारें पाल पोस कर बांटती सुख आनन्द

देती धक्का शर्मसार हो रह न सका मैं बन्द

निकल न पाऊं, रह ना पाऊं अद्भूत रही सुरंग

ममता खदेड़ रही क्यों मुझको छिड़ी हुई क्यों जंग

   

शिशु जन्म ले इसमे चाहे हों जितने संताप

मातृभूमि को छोड़ विदेश मे बसना है क्या पाप ? 

   

प्रेरणा :  राहुल सांकृत्यायन -http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/ghummakkad/ghummakad1.htm

http://rachanakar.blogspot.com/2007/08/maa-aur-matrubhoomi.html

 

For Lotus in the Mud

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