धुमिल हो गये
( युद्ध की विभिषिका से पीड़ितों को समर्पित )
टकरा लिये मौत से हरदम जीवन से अब हारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
क्रूर इरादे शैतानों के
कि्रड़ा करते रहे आग में
गोली तोपों की आवाजें
भर देते हैं दिल दिमाग मे
जूझ रहे हैं हालातों से ये नसीब के मारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
स्वार्थ किसी का बन चुड़ेल
करता है कैसी लीला
भूख गरीबी कंगाली
में देखो आटा गीला
फैल रही बिमारी ऐसी छुटे सभी सहारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
भाई जुदा होगये
अकेलापन खाने को दौड़े
अंग जुदा हो गये
कि पीड़ा बरस रही या कोड़े
शहर हुआ श्मशान कि देखो कफन हमें पुकारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
- हरिहर झा
For “The weather”
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-weather/
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बहुत बढिया रचना है। सही चित्र खीचां है-
क्रीड़ा करते रहे आग में
गोली तोपों की आवाजें
भर देते हैं दिल दिमाग मे
जूझ रहे हैं हालातों से ये नसीब के मारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
Comment by paramjitbali — September 6, 2007 @ 7:57 am
वाह, हरिहर जी-क्या बात है. बहुत खूब!!
Comment by समीर लाल — September 6, 2007 @ 3:07 pm
bahut hi sundar rachanaa baar baar padne ko majbur hogye.
Comment by hemjyotsana parashar — September 6, 2007 @ 7:05 pm
परमजीत जी , समीर जी, हेमज्योत्स्ना जी
बहुत बहुत धन्यवाद
मुझे आपकी साइट देखने का मौका मिलता है।
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — September 14, 2007 @ 5:19 am