हरिहर झा › सिडनी हिन्दी समाज द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन क्रूज़ में
September 29, 2007
हरिहर झा › Create New Post — WordPress
September 20, 2007
जहरीला सांप
भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप
उगले जहर घृणा का कितना नाप सके तो नाप
नीच इरादा पूरा करने लिया धरम का डंडा
निर्बल का लहू चूस रहा हट्टा कट्टा मुस्टंडा
बुद्धि बल कुछ नहीं पास में लिया हाथ मे डंडा
स्वारथ पूरा करने नित अपनाता ये हथकंडा
खून खराबे देख गया मानवता का दिल कांप
भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप
विधवा हो गई कईं सुहागिन जीवन अब दुश्वार
कितने बच्चे बिन मां के बस रोते हैं लाचार
मनचाही मांगे रख दी फैलाया मृत्यु का डर
भोले भाले लोगों की हत्यायें करता कायर !
दूथ पिलाओ जहर उगल कर देता यह संताप
भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप
चूहा बहादुरी दिखाता छिपी ढ़ोल मे पोल
मानव जीवन की मर्यादा लहू मांस से तोल
गीद्ध लोमड़ी कैसे जाने जीवदया का मोल
रावण, कंस की दानवता को लिया हृदय में घोल
क्रूर इरादे शैतानों के भांप सके तो भांप
भेष आदमी का धर कर आया जहरीला सांप
(समर्पित : आतंकवादियों को )
- हरिहर झा
Who is “Lisa!”?read on :
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/14/lisa/
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September 13, 2007
खिलने दो खुशबू पहचानो
विषम स्थिति हो लोग पराये फिर भी सब मे ईश्वर जानो
भांति भांति के फूल जगत मे खिलने दो खुशबू पहचानो
अन्तरिक्ष में ज्वाला भड़की चांद सितारे अस्त हुए
महाकाल ने डेरा डाला देवलोक भी ध्वस्त हुए
शीत लहर में आहें सिसकी कैसा यह हिमपात हुआ
चरम अवस्थाओं के झूले घात गई प्रतिघात हुआ
कहा धरा ने संयम बरतो देखो जीवन को पहचानो
बगिया बोली कली प्यार की खिलने दो खुशबू पहचानो
धर्म मार्ग पर यथा बाल शिशु किलकारी भरते जाते
भक्तिभाव का रस पी पी कर आनंदित होकर गाते
छन्द ताल मे बहे नदी उन्मुक्त बहे गति से झरना
शब्द ब्रह्ममय जगत यहां बिन दाग चदरिया को धरना
पोंगा पंडित इतराया तुम वेदशास्त्र को क्या जानो
कहा जगत ने अरे इन्हे भी खिलने दो खुशबू पहचानो
जंजीरों मे घिरी नारियां हुई स्वतन्त्रता बेमानी थी
देवी कह कर फुसलाया शोषण की नीति ठानी थी
सूत्रपात हो क्रान्ति का ‘आधीदुनियां’ को होश हुआ
प्रगति पथ पर अधिकारों की समता का उद्घोष हुआ
भोग्या नहीं, नहीं अबला है स्त्रीशक्ति को पहचानो
प्रेमस्रोत के फूल महकते खिलने दो खुशबू पहचानो
-हरिहर झा
http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_03/03_04pravishtiyan3.htm#hj
For “Hunger – 3 Faces: ( Which one is 3rd Face?)
http://hariharjha.wordpress.com/
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September 6, 2007
धुमिल हो गये
( युद्ध की विभिषिका से पीड़ितों को समर्पित )
टकरा लिये मौत से हरदम जीवन से अब हारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
क्रूर इरादे शैतानों के
कि्रड़ा करते रहे आग में
गोली तोपों की आवाजें
भर देते हैं दिल दिमाग मे
जूझ रहे हैं हालातों से ये नसीब के मारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
स्वार्थ किसी का बन चुड़ेल
करता है कैसी लीला
भूख गरीबी कंगाली
में देखो आटा गीला
फैल रही बिमारी ऐसी छुटे सभी सहारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
भाई जुदा होगये
अकेलापन खाने को दौड़े
अंग जुदा हो गये
कि पीड़ा बरस रही या कोड़े
शहर हुआ श्मशान कि देखो कफन हमें पुकारे
आंधी ऐसी धुमिल हो गये नभ के चांद सितारे
- हरिहर झा
For “The weather”
http://hariharjha.wordpress.com/2007/02/16/the-weather/
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