हरिहर झा

August 30, 2007

लम्हा

Filed under: तुकान्त, शब्दान्जलि — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:46 am

नदी की बूंद सा बहता लम्हा
हुआ ना तिजोरी मे कैद लम्हा

 

ख्यालों पे जीवन लुटाता रहा
जीत हार बदले मे पाता रहा
हथेली पे सरसों उगाई जीवन भर
मरने की आशा जुटाई जीवन भर

   

टिक टिक  घड़ी की सुनाता लम्हा
सपनो के जाले बुनाता लम्हा

 

काटे कटता समय यों अकेले
लगा पंख उड़ता भर बीच मेले
तन्हाई गमो की कब बोल पाई
हंसती गाती राहें सब को भाई

 

चुप चुप चले बोर करता लम्हा
घेरे खुशी शोर करता लम्हा

नाटक जग का प्यारनफरत लाये
ना जाने किस क्षण र्पदा गिर जाये
चेतना का दीपक जलाता तिल तिल
तो भी यह चक्रव्यूहभेदन मुश्किल

 

परतदरपरत प्याज खुलता लम्हा
तीखी कुछ मीठी गन्ध देता लम्हा।

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3 Comments »

  1. Agarche shahar mein mela dikhai deta hai /
    Harek shakhs akela dikhai deta hai //

    Comment by prakruti — August 30, 2007 @ 7:31 am

  2. बहुत खूब !

    हमे भी आपके ईलेक्‍ट्रो – त्रिदोष – ग्राम के
    बारे में जानने मिला

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — August 30, 2007 @ 9:18 am

  3. बहुत सही!!

    Comment by समीर लाल — August 30, 2007 @ 2:26 pm

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