मोम की कसक जो दर्द बन गई
पिघलपिघल लौ से दूर हो गया
आंसुओं की गर्मी से कराह कर
खण्ड मे बंटा तो चूर हो गया
रागरागिनी के लय विलय हुये
छटपटाता भाव मौन हो गया
ग्रीष्म चूसता रहा समुद्र को
अंधकार चांद ही को डस गया
लड़झगड़ नदी सुमेरू श्रृंग के
केश घने खींच कर पकड़ रही
वायु भय से कांप कर लिपट रही
पर्वतों की चोंटियां जकड़ रही
सुन विलाप जलप्रपात जब हंसा
क्यों हंसा जो गिर रहा पाताल मे
अन्तर्मुखी हो सुन रहा गाती हुई
माधुरी के स्वर अनोखी ताल में
किरन भी यह देख कर के हंस उठी
हंस उठी आकाश की गहराईयां
दूर हुई छिटक करके बह गई
खो गई लो गमो की परछाईयां
कलि मुस्कुराई देख कर सभी
चेहरे खुशी से खिल रहे भले
चांदनी नजर मिलाती चांद से
फूल तितलियों से मिल रहे गले
अभिसार अर्चना का रूप ले
मेघ की उड़ान नृत्य बन गई
दामिनी का नृत्य प्यार हो उठा
प्यार की उमंग फिर बहक गई।
-हरिहर झा
For “Blackens your Face” read
http://hariharjha.wordpress.com
or
http://hariharjha.wordpress.com/2007/08/23/blackens-your-face/
अच्छी रचना है !!
Comment by mamta — August 23, 2007 @ 4:58 am |
वाह, क्या छटा है – सावन में प्रकृति भी छा गयी है और उमंग भी!
Comment by ज्ञानदत पाण्डेय — August 23, 2007 @ 6:12 am |
bahut sundar lagi aapki rachana ..
Comment by ranjana — August 23, 2007 @ 6:27 am |
धन्यवाद ममता जी व ग्यानद्त्त जी
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — August 23, 2007 @ 6:32 am |
धन्यवाद रंजना जी इस बहाने आपकी कवितायें पढ्ने का मॊका मिला
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — August 23, 2007 @ 7:15 am |
नवीन प्रतीकों-बिंबों की अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर है…पूरी कविता एक विशेष आभा से अभिसिक्त है….बहुत बहुत बधाई…
डा. रमा द्विवेदी
Comment by ramadwivedi — August 24, 2007 @ 9:35 am |
धन्यवाद डा. रमा जी
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — August 26, 2007 @ 8:03 am |