पौ फटी नभ लाल हो कर सूर्य से शरमा रहा
चांद गर्वित रूप था कल
मेरे आगे कुछ नहीं
लजाती दुल्हन से पूछो
मेरी उपमा हर कहीं
दाग नभ के आईने में जाने क्यों है मुहं चिढ़ाता
फेंक ठन्डी रोशनी बस मन ही मन शरमा रहा
मुहं छिपा कर चांदनी से चांद अब शरमा रहा
गर्व यौवन का छलकता
भिगा देता तन बदन
वार रति का पार होता
बिद्ध उर होता मदन
रूप का अंबार बन
गलहार बांहों मे सिमटता
हुस्न अपने इश्क के दामन मे यों शरमा रहा
मेहबूब ढ़ंक कर चेहरा जुल्फों में यों शरमा रहा ।
पौ फटी नभ लाल हो कर सूर्य से शरमा रहा ।
-हरिहर झा
For “Long live hypocrisy” :
http://hariharjha.wordpress.com/2007/08/07/long-live-hypocrisy/
or
बहुत सुंदर, वाह!!
Comment by समीर लाल — August 10, 2007 @ 1:31 pm |
फेंक ठन्डी रोशनी बस मन ही मन शरमा रहा
मुहं छिपा कर चांदनी से चांद अब शरमा रहा
मुझे ये line बहुत अच्छी लगी| धन्यबाद
Comment by Brij — August 11, 2007 @ 7:20 am |
धन्यवाद राकेश जी आप भी “सिक्के की ऒकात” व आग की भीख में
जोर शोर से उपस्थित हुये हॆं
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — August 13, 2007 @ 12:24 am |
धन्यवाद समीर जी
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — August 13, 2007 @ 12:25 am |