हरिहर झा

August 2, 2007

रिमझिम यह बरसात

Filed under: अनुभूति, तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:17 am

 मनमयूर लो नचा गई
रिमझिम यह बरसात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौगात
 
भीगा सावन प्यार मे
जल मे भीगा बदन
सजनी साजन से करे
कैसे प्रणयनिवेदन?
 
छमछम पायल बज उठे
चूड़ी बजती खनखन
बोल नहीं पाते अधर
झूमता आया पवन
 
कानों में कुछ कह गया
प्यारीप्यारी बात
मनमयूर लो नचा गई
रिमझिम यह बरसात
          * 
पिया बिना बरसात मे
काटी रतियां जाग
वेणी फूलों से लदी
डसती जैसे नाग
 
अंगारों सा क्यों लगे
हराभरा यह बाग
तन जल मे मन जल उठे
पानी मे यह आग
कांटे दिल तक ना चुभे
दी गुलाब ने मात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौग़ात
        * 
डूब गया घरबार सब
बहा गई लंगोट
किया बसेरा फटी हुई
चादर की ले ओट
 
हेलीकोप्टर आ गए
नेता मांगे वोट
आंसू मगरमच्छ के
दिल पर करते चोट
  
फंड हजम कर रो रही
जनता को दी लात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौगात।
- हरिहर झा
 

 http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/varshamangal/sets/41aug.html
 

4 Comments »

  1. हरिहर जी बहुत बढिया रचना लिखी है ।वाह! क्या खूब लिखा है-

    डूब गया घरबार सब
    बहा गई लंगोट
    किया बसेरा फटी हुई
    चादर की ले ओट

    Comment by paramjitbali — August 2, 2007 @ 6:19 am |Reply

  2. धन्यवाद परमजीत जी
    खुशी हुई जान कर कि कविता आपको पसंद आई

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — August 2, 2007 @ 6:58 am |Reply

  3. अच्छा लिखा है आपने !

    Comment by मनीष — August 2, 2007 @ 9:52 am |Reply

  4. धन्यवाद मनीष जी
    अपनी शाम की चन्द घड्रियां मुझे दी

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — August 3, 2007 @ 12:23 am |Reply


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