हरिहर झा

August 30, 2007

लम्हा

Filed under: तुकान्त, शब्दान्जलि — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:46 am

नदी की बूंद सा बहता लम्हा
हुआ ना तिजोरी मे कैद लम्हा

 

ख्यालों पे जीवन लुटाता रहा
जीत हार बदले मे पाता रहा
हथेली पे सरसों उगाई जीवन भर
मरने की आशा जुटाई जीवन भर

   

टिक टिक  घड़ी की सुनाता लम्हा
सपनो के जाले बुनाता लम्हा

 

काटे कटता समय यों अकेले
लगा पंख उड़ता भर बीच मेले
तन्हाई गमो की कब बोल पाई
हंसती गाती राहें सब को भाई

 

चुप चुप चले बोर करता लम्हा
घेरे खुशी शोर करता लम्हा

नाटक जग का प्यारनफरत लाये
ना जाने किस क्षण र्पदा गिर जाये
चेतना का दीपक जलाता तिल तिल
तो भी यह चक्रव्यूहभेदन मुश्किल

 

परतदरपरत प्याज खुलता लम्हा
तीखी कुछ मीठी गन्ध देता लम्हा।

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August 23, 2007

प्यार की उमंग

Filed under: गीत, तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:58 am
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मोम की कसक जो दर्द बन गई

पिघलपिघल लौ से दूर हो गया

आंसुओं की गर्मी से कराह कर

खण्ड मे बंटा तो चूर हो गया

   

रागरागिनी के लय विलय हुये

छटपटाता भाव मौन हो गया

ग्रीष्म चूसता रहा समुद्र को

अंधकार चांद ही को डस गया

     

लड़झगड़ नदी सुमेरू श्रृंग के

केश घने खींच कर पकड़ रही

वायु भय से कांप कर लिपट रही

पर्वतों  की चोंटियां जकड़ रही

       

सुन विलाप जलप्रपात जब हंसा

क्यों हंसा जो गिर रहा पाताल मे

अन्तर्मुखी हो सुन रहा गाती हुई

माधुरी के स्वर अनोखी ताल में

   

किरन भी यह देख कर के हंस उठी

हंस उठी आकाश की गहराईयां

दूर हुई छिटक करके बह गई

खो गई लो गमो की परछाईयां

      

कलि मुस्कुराई देख कर सभी

चेहरे  खुशी से खिल रहे भले

चांदनी नजर मिलाती चांद से

फूल तितलियों से  मिल रहे गले

   

अभिसार  अर्चना का रूप ले

मेघ की उड़ान नृत्य बन गई

दामिनी का नृत्य प्यार हो उठा

प्यार की उमंग फिर बहक गई।

-हरिहर झा

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August 16, 2007

अंगुर खट्टे हैं

Filed under: तुकान्त, व्यंग्य, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:15 am

मेहनत मधुमक्खी  करले हम घोघे और तिलचट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

  

सुस्ती हरदम छाई रहती काम करे तो कौन

हाथ उठाना दूभर है तो हुये सभी हम मौन

दुनियां चांद पे जा पहुंची हम तो पलंग पे सोये

काहे करते माथापच्ची  हम सपनो में खोये

   

भाग्य भरोसे बैठ रहे खेले जूये और सट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

  

हो डाली पर बैर मीठा  ले लेने में कष्ट

काहे खोजें परमाणु बम  दुनियां होवे नष्ट

शयन भंग ना हो र खाना पीना अच्छा कितना

बिना काम लड्डू मिल जाय भाये मन मे कितना

   

हुआ काम हराम तभी तो पेट पे बांधे पट्टे हैं

मिल जायें  तो मीठे ना मिल पाये  अंगुर खट्टे हैं

   

मिलना होगा मिल जावेगा पचड़ा व्यर्थ लिया क्यों

अन्धे विश्वासों मे पल कर दर्शन खड़ा किया यों

मिथ्या यह संसार, जगत है सुन्दर सा इक सपना

नसीब मे जितना भी लिखा बस उतना ही अपना

  

दौड़धूप से नानी मरती भले ही हट्टे-कट्टे हैं

मिल जायें तो मीठे ना मिल पाये अंगुर खट्टे हैं

                    -हरिहर झा

August 10, 2007

शरमा रहा

Filed under: तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:43 am
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पौ फटी नभ लाल हो कर सूर्य से शरमा रहा

चांद गर्वित रूप था कल

मेरे आगे कुछ नहीं

लजाती दुल्हन से पूछो

मेरी उपमा हर कहीं

दाग नभ के आईने मे जाने क्यों है मुहं चिढ़ाता

 

फेंक ठन्डी रोशनी बस मन ही मन शरमा रहा

मुहं छिपा कर चांदनी से चांद अब शरमा रहा

 

गर्व यौवन का छलकता

भिगा देता तन बदन

वार रति का पार होता

बिद्ध उर होता मदन

रूप का अंबार बन

गलहार बांहों मे सिमटता

हुस्न अपने इश्क के दामन मे यों शरमा रहा

मेहबूब ढ़ंक कर चेहरा जुल्फों में यों शरमा रहा । 

पौ फटी नभ लाल हो कर सूर्य से शरमा रहा

            -हरिहर झा  

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August 2, 2007

रिमझिम यह बरसात

Filed under: अनुभूति, तुकान्त — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:17 am

 मनमयूर लो नचा गई
रिमझिम यह बरसात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौगात
 
भीगा सावन प्यार मे
जल मे भीगा बदन
सजनी साजन से करे
कैसे प्रणयनिवेदन?
 
छमछम पायल बज उठे
चूड़ी बजती खनखन
बोल नहीं पाते अधर
झूमता आया पवन
 
कानों में कुछ कह गया
प्यारीप्यारी बात
मनमयूर लो नचा गई
रिमझिम यह बरसात
          * 
पिया बिना बरसात मे
काटी रतियां जाग
वेणी फूलों से लदी
डसती जैसे नाग
 
अंगारों सा क्यों लगे
हराभरा यह बाग
तन जल मे मन जल उठे
पानी मे यह आग
कांटे दिल तक ना चुभे
दी गुलाब ने मात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौग़ात
        * 
डूब गया घरबार सब
बहा गई लंगोट
किया बसेरा फटी हुई
चादर की ले ओट
 
हेलीकोप्टर आ गए
नेता मांगे वोट
आंसू मगरमच्छ के
दिल पर करते चोट
  
फंड हजम कर रो रही
जनता को दी लात
लिखी किसी के भाग्य मे
आंसू की सौगात।
- हरिहर झा
 

 http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/varshamangal/sets/41aug.html
 

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