लम्हा
नदी की बूंद सा बहता लम्हा
हुआ ना तिजोरी मे कैद लम्हा
ख्यालों पे जीवन लुटाता रहा
जीत हार बदले मे पाता रहा
हथेली पे सरसों उगाई जीवन भर
न मरने की आशा जुटाई जीवन भर
टिक टिक घड़ी की सुनाता लम्हा
सपनो के जाले बुनाता लम्हा
काटे न कटता समय यों अकेले
लगा पंख उड़ता भर बीच मेले
तन्हाई गमो की कब बोल पाई
हंसती गाती राहें सब को भाई
चुप चुप चले बोर करता लम्हा
घेरे खुशी शोर करता लम्हा
नाटक जग का प्यारनफरत लाये
ना जाने किस क्षण र्पदा गिर जाये
चेतना का दीपक जलाता तिल तिल
तो भी यह चक्रव्यूहभेदन मुश्किल
परतदरपरत प्याज खुलता लम्हा
तीखी कुछ मीठी गन्ध देता लम्हा।
For “My Mistress!”
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