शेर
ये नशीली आंखे जो मिली मर कर कयामत के दिन
समझा कयामत में भी पाई सागरेशराब
हंसी लब खुले पर निकल न पाया कोई लफ्ज़
ये मुहब्बत का अंदाजेबयां या दिल मे कशमकश
हां पर उड़ते आकाश मे ना कहती तो मर जाते
सवालेवस्ल सुना झट से क्यों गर्दन झुकाली
इकरारेमुहब्बत का अन्दाजेबयां सुभानल्ला
जरूर दिल से गुफ्तगू में पस्त हुआ जमाने का डर
नामोनिशां न होगा कल से रंग का रूप का
शामे जुदाई इस डर से खड़ी है रंगीन लिबास में
लब सी लिये मैंने जमाने की शिकायत सुन कर
गमख्वार मिला तो चंद शेर सुनाने को तरस गया
जिन्दगी करती खुशामद कि यह लो वह लो
खूनेतमन्ना के बाद बाकी क्या बच गया
बिखर गई तेरी महफिल फिर दुबक लिये सपनो मे
दिल से कभी जाने न देंगे दिल का ये वादा है
कह दिया जो कल तुमने हर लफ्ज मे बस तुम हो
था एक अदना सा सपना वह सपना केवल तुम हो
-हरिहर झा
शुभान अल्लाह !
Comment by Sanjeeva Tiwari — July 19, 2007 @ 1:14 am
हर शेर अपने आप में बेहतरीन माहौल बना रहे हैं, दाद कबूलें. थोड़ा एक को जमीन बना कर गज़ल का स्वरुप दें तो आनन्द बढ़ जाये. आपकी इच्छा, भाई. कहो तो एकाध चुरा कर (विथ परमिशन) आगे बढ़ाऊं.
Comment by समीर लाल — July 19, 2007 @ 1:15 am
Samir Ji
Dhanyavaad. Aage badaayeM aur antim swaroop mujhe
bhejanaa na bhooliye.
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — July 19, 2007 @ 1:52 am
Dhanyavaad Sanjeeva Ji
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — July 19, 2007 @ 1:53 am
हरिहर जी,बहुत बढिया शेर हैं सभी एक से बढ्कर एक है।बधाई ।
इकरारेमुहब्बत का अन्दाजेबयां सुभानल्ला
जरूर दिल से गुफ्तगू में पस्त हुआ जमाने का डर
बहुत बढिया लगा।
Comment by paramjitbali — July 19, 2007 @ 12:42 pm
हरिहर जी एक निवेदन है।कृपया फान्ट का साईज बडा करे।
Comment by paramjitbali — July 19, 2007 @ 12:44 pm
Dhanyavaad Paramjit Ji
Achchha lagaa aapko sher pasaNd aaye.
Ab bade se badaa font dene ki koshish arooNgaa.
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — July 20, 2007 @ 12:57 am