घटिके! *
घटिके! तू रो मत
चिल्ला मत
तुझे ही क्या
इस नारी ने
किस किस को
हंसा हंसा कर
नही रुलाया
नहीं नचाया।
इस नारी ने
राम को वनवास देकर
रावण से भिड़वाया
अंधे का बेटा अंधा कह कर
महाभारत छिड़वाया।
फिर तुझे नचाने मे तो
उसकी पतली कमरियां
लचक जाती है।
कोमल कलाईयां
मचक जाती हैं
इसका तू गर्व कर!
अब
चुप कर बावरी घटिके!
तू रो मत
चिल्ला मत ।
- हरिहर झा
*(एक संस्कृत श्लोक की छाया मे)
घटिके! = hand-driven Flour Mill
अरे बन्धु, घर के जांत या चकरी पर इतना बढ़िया हास्य!
हम लोग पहले क्यों न मिले. कविता मुझे ज्यादा समझ नहीं आती पर हम मिल करेंगे!
Comment by ज्ञानदत पाण्डेय — July 12, 2007 @ 5:22 am
एक बढिया कविता बढिया शब्दों से संजो कर लिखी है। अच्छी रचना है।बधाई।
फिर तुझे नचाने मे तो
उसकी पतली कमरियां
लचक जाती है।
कोमल कलाईयां
मचक जाती हैं
इसका तू गर्व कर!
Comment by paramjitbali — July 12, 2007 @ 5:31 am
Gyandatt Ji va Parmjit Ji
Aapko kavita pasand aai yah jaan kar achchha lagaa.
Kavita ki achchhaai Praachin-Sanskrit Saahitya ke
madhur haasya ki hei. Koi bhi kamjori ho to
vah meri apni hei.
Punahshcha, Dhanyavaad.
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — July 12, 2007 @ 6:48 am
प्रिय हरिहर जी..जहाँ तक पंक्तियों का सवाल है… अच्छी हैं किंतु मेरी भावनाएं इससे बिलकुल अलग हैं..क्या इंसान की मति इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि सारी कुमति का दोष नारी को मढ़ दिया जाए? भगवान ने सबको मस्तिष्क दिया है.. तो क्या नारी इसका बेहतर उपयोग जानती है?..
कवि कुलवंत
Comment by Kavi Kulwant — July 13, 2007 @ 5:59 am
Kulwant Sing Ji
Mei aapse poori tarah sahmat huN.
Vidyaarthi-Jeevan mei yah kavitaa vinod mei aakar
likhi thi. Ise shuddha vinod ke roop me hi lene
yogya hei.
Mere apne vichaar in paNktiyoN me :
जंजीरों मे घिरी नारियां हुई स्वतन्त्रता बेमानी थी
देवी कह कर फुसलाया शोषण की नीति ठानी थी
सूत्रपात हो क्रान्ति का ‘आधीदुनियां’ को होश हुआ
प्रगति पथ पर अधिकारों की समता का उद्घोष हुआ
भोग्या नहीं, नहीं अबला है स्त्रीशक्ति को पहचानो
प्रेमस्रोत के फूल महकते खिलने दो खुशबू पहचानो
http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_03/03_04pravishtiyan3.htm#hj
Comment by Harihar Jha — July 16, 2007 @ 2:08 am